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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 418

भूगोल खगोल वर्णनम् ३२१
शीघ्र परिधि अंश = (भचक्रांश x शीघ्र कक्षा) / मन्दकक्षा
शतघ्नाम्बर षट् पूर्णरामा (३०,६,०००) मध्येन्दु कक्षिका
भानां खखाभ्र नागाष्ट दृङ् नाग नखनीरदाः (१७,२०,८२,८,०००) । १७ ।
चन्द्र कक्षा (३०,६,०००) योजन है । नक्षत्र कक्षा - (१७,२०,८२,८८,०००)
योजन है ।
स्व स्व कक्षेन्दु गोभू (१९१) घ्नी ख ख सूर्यहता (१२००) श्रुतिः
मध्यासूर्याद बुधादीनां भूमेश्चैन्दु भास्वताम् । १८ ।
ग्रह की अपनी अपनी कक्षा को १९१ से गुणा कर १२०० से भाग देने पर बुध
शुक्र मंगल गुरु और शनि को सूर्य से तथा नक्षत्र तथा चन्द्र का पृथिवी से मन्दकर्ण
(दूरी) होता है ।
मन्द श्रुति कला निघ्नी मध्या त्रिज्योद्धृता स्फुटा
मध्यवन्मन्द संस्कारः सूर्याज्ञसित शीघ्रयोः । १९ ।
मध्य कर्ण को स्फुट मन्दकर्ण की कला से गुणा कर त्रिज्या ( ३४३८) से
भाग देने पर फल सूर्य का योजन में मन्द कर्ण (दूरी) होता है । जिस प्रकार मध्य
ग्रह का मन्दफल संस्कार किया जाता है । उसी प्रकार बुध और शुक्र के शीघ्रोच्च
में मन्दफल संस्कार होता है ।
भूमध्यात् स्फुट भौमादि कर्णज्ञानाय मध्यमः
कर्णस्तृतीय कर्णदना स्त्रिज्या भक्तोऽथ तुर्यया । २० ।
पृथिवी केन्द्र से मंगल आदि ६ ग्रहों का योजन में (शीघ्र कर्ण जानने के लिए
मध्यम कर्ण को तृतीय कलात्मक मन्दकर्ण से गुणा कर त्रिज्या से भाग देंगे । फल
को चौथे-
श्रुत्याभ्यस्त स्त्रिज्जीवाप्तः कार्यः कक्षापि कर्णतः
साध्या खखार्क (१२००) गुणितात् कुनवेन्दुभि (१९१) रुद्धतात् । २१ ।
शीघ्रकर्ण से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने पर मंगल आदि ग्रहों का योजन
में शीघ्र कर्ण होगा । कर्ण को १२०० से गुणा कर १९१ से भाग देने पर कक्षा
होगी ।
मन्दोच्चानाञ्च पातानां भगणाश्रित भावतः
कक्षा नक्षत्र कक्षैव ज्ञेया दृश्येतर त्विषाम् । २२ ।
मन्दोच्च और पात भगण आश्रित होने के कारण इनकी कक्षा नक्षत्र कक्षा से
ही ज्ञात होगी, यह देखने से नहीं पता चलेगा ।