सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० सिद्धान्त दर्पण
व्याक्ष दृक् कर्मखेटार्कान्तर लग्ना सुसम्भवाः
काल भागा हृतास्ते स्युर्गत गम्य दिनादयः । ३२ ।
आक्ष और दृक् कर्म के बिना रवि और मार्गी ग्रह की गति के अन्तर से इष्ट
कालांश के अन्तर में भाग देने से फल गत या गम्य दिन आदि होगा ।
ग्रहे वक्रिणित् सूर्य भुक्ति योगेन भाजिताः
नक्षत्रोदय कालार्कात्तदस्त समय कालिकम् । ३३ ।
ग्रह वक्री होने पर उसके और रवि के गति योग से कालांश अन्तर में भाग
दिया जायेगा । दिन आदि फल पूर्व नियम के अनुसार गत या गम्य काल होगा ।
प्रोज्झ्य स्फुट रविं शिष्ट भागानि लिकृताः . पुनः
भध्रुव स्थार्क भुक्त्याप्ता भवन्त्यान्तर वासराः । ३४ ।
नक्षत्र के उदय और अस्त काल का स्फुट रवि निकाल कर दोनों की अन्तर
कला निकालते हैं । उसको नक्षत्र ध्रुव स्थान के रवि की गति कला से भाग देने
पर नक्षत्र के उदय से अस्त तक का दिन आदि समय आयेगा ।
स्फुटा स्फुट क्रान्तिज्यैरन्तरं यदिनाद्धं यो
तत्प्राणा शशिलिमा (१८००) घ्नास्तदस्तो दय जासुभिः । ३५ ।
नक्षत्र के स्फुट क्रान्ति के दिनार्द्ध और अस्फुट क्रान्ति के दिनार्द्ध के अन्तर
असु को (१८००) से गुणा कर अयनांश संस्कृत (सायन) अस्त का उदय रात्रि के
उदयासु से
चलांश संस्कृते भुंक्ता लब्ध दृक् क्रम लिप्ति काः
ऋक्षस्य सौम्य विक्षेपे क्रमात् प्राक् पश्चिम स्थितौ । ३६ ।
भाग देने पर फल आक्ष दृक् कर्म कला आदि होगा । नक्षत्र का उत्तर शर
पूर्व या पश्चिम में होने पर क्रमानुसार
तद् ध्रुवे वियुक्ता युक्ता याम्येक्षौ संयुतो निताः
दृक् कर्म ध्रुव एवं स्यात्तत्र क्षेत्रांश संस्कृति । ३७ ।
नक्षत्र के ध्रुव से घटायेंगे या जोड़ेंगे । नक्षत्र का दक्षिण शर पूर्व या पश्चिम
में होने पर इसे ध्रुव में जोड़े या घटायेंगे । फल को दृक् कर्म ध्रुव कहते हैं और
इसी का क्षेत्रांश संस्कार किया जाता है ।
कालांशा योगताराणा ये सिद्धा उदयास्तजाः
ते राशि कलिका (१८००) भ्यस्ताः प्राच्या स्वोदय जासुभिः । ३८ ।
नक्षत्र के योगतारा का जो उदय या अस्त कालीन कालांश लिखा हुआ है
उसकी कला कर १८०० से गुणा करते हैं । फल को नक्षत्र पूर्व दिशा में होने पर
उसकी राशि के उदयासु से, और