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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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२०४ सिद्धान्त दर्पण
वरद्रुम ततोद् भट द्युति रनिष्ठ कूटाट वो
फटाधर फटाच्छटनटान पाटवी पाटयेत् । ९३ ।
जो अपने पीताम्बर से शुद्ध स्वर्ण आभूषण की शोभा को लज्जित करते हैं,
जो ब्रह्माण्ड रुपी कड़ाही में रचना तथा घटनाओं पर तीक्ष्ण दृष्टि रखे हुए हैं । जो
कालिय नाग के फण पर नृत्य करने में कुशल हैं तथा जो कल्प वृक्ष के निकट
बहुत प्रकाशित हैं वहीं महाप्रभु जगन्नाथ हमारे अनिष्ट समूह रूपी वन को नष्ट
करें ।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे ।
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
यातोऽत्र भग्रह युगर्क (१२) मितः प्रकाशः । ९४ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणित
और दृष्टि में समानता तथा छात्रों की शिक्षा के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण में
नक्षत्र और ग्रह की युति सम्बन्धी द्वादश अध्याय समाप्त हुआ ।