सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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शीघ्र केन्द्र यदि बुध और शुक्र का सूर्य से ६ राशि के अन्तर पर है अर्थात्
वे सूर्य और पृथ्वी के बीच में हैं तो शर (सूर्य से कोणीय अन्तर अर्थात् क्रान्ति
वृत्त से दूरी) बहुत कम होने के कारण वह सूर्य बिम्ब से गढ्ढे के समान अर्थात्
प्रकाश की तुलना में काला छेद जैसा दीखेगा ।
स्फुट भास्वर बिम्बानां दृग् बिम्ब मथोच्यते
दूरस्थ दीपा इवते स्थूला भान्ति यदीक्षिता । ५२ ।
अब भास्वर बिम्ब का दृश्य परिभाषा कहा जाता है । दूर रखे दीप की तरह
भास्वर बिम्ब स्थूल दीखते है ।
दूरे पथेः स्थिति मतां स्व व्यासतिथिदृग् (२१५) गुणात्
ज्योतिषां स्थूलता लोके दृश्यते क्रमवृ द्धितः । ५३ ।
बहुत दूरी पर प्रकाशमान वस्तु होने पर वह अपने वास्तविक कोणीय व्यास
का २१५ गुणा तक लोगों को दीखता है ।
तद् बिम्ब नृप (१६) घातस्य कला देः पदमेव यत् ।
ताराग्रहाणां दृग् बिम्बं स्वं स्वं तद् भवति स्फुटम् । ५४ ।
भास्वर बिम्ब कला को १६ से गुणा कर उसका वर्ग मूल निकालने पर तारा
ग्रहों का दृश्य बिम्ब मान होता है ।
भाना स्वतो भास्वरत्वात् समदूर स्थिते-क्षिते-
साम्य सदैव किन्त्वेषां कार्या दृग् बिम्बशालिता । ५५ ।
नक्षत्र (तारा) स्वयं प्रदीप्त हैं । इनकी दूरी पृथ्वी से घटती बढती नहीं है
अतः उनके बिम्ब मान में कोई अन्तर नहीं दीखता है तथापि उनका दृश्य बिम्ब
परिमाण निकालना चाहिये ।
युद्ध भेदानयो वक्ष्ये ग्रहयोः समलिप्तयो
दृग् बिम्बान्त द्वयस्पर्शे युद्ध मुल्लेखनामकम् । ५६ ।
अब बराबर राशि कला के ग्रहों के युद्ध (समागम) के भेद (प्रकार) कहे
जाते हैं । दो ग्रहों का दृग् बिम्ब स्पर्श करने पर उसको उल्लेख युद्ध कहा जाता
है ।
बिम्ब वेधे च भेदाख्यं मान योगाल्पकेऽन्तरे ।
तस्यादंशु विमर्दाख्य मप सव्यं ततोऽधिके । ५७ ।
एक ग्रह का बिम्ब दूसरे ग्रह में प्रवेश (वेध) करे तो उस योग को भेद युद्ध
कहते हैं । दोनों ग्रहों का याम्य (उत्तर दक्षिण) या सौम्य (पूर्व पश्चिम) अन्तरयदि
मानैक्य (बिम्बमान का योग) से कम हो तो वह अंश विमर्द युद्ध है । दोनों ग्रहों
की परस्पर दूरी यदि बिम्ब योग से अधिक हो तो अपसव्य कहलाता है ।