सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रह युति वर्णनम् १७९
अंशा वधि भवत्येन भागाधिक्ये समागमः
सम्भवेत्वपसव्यस्य यद्येकोदीप्तिमान ग्रहः । ५८ ।
जब उनका अन्तर १ अंश (६०) कला तक हो) ग्रह दूरी तथा बिम्ब योग का
अन्तर यदि एक अंश से ज्यादा हो तो वह समागम कहलाता है। अपसव्य के
समय यदि एक ग्रह दीप्तिमान हो तथा
अन्यो विवर्ण स्तद् युद्धं दीप्तौ द्वौ चेत्समागमः
तत्र द्वौ चेद्रश्मि हीनो कूट युद्धं तं दुच्यते । ५९ ।
दूसरा विवर्ण (क्रान्ति हीन-पृथ्वी और सूर्य के बीच) हो तो उसे युद्ध कहा
जाता है । दोनों दीप्ति मान होने से समागम कहलाता है । अपसव्य में दोनों कान्ति
हीन होने से कूट युद्ध कहा जाता है ।
स्थूल बिम्बो जयी खेट स्तुल्य यो रुत्तरस्थितः
जितोऽणुः समयोर्याम्यः सर्वदा सर्वजिद् भृगुः । ६० ।
अंश कलादि समान दो ग्रहों में उत्तर वाला ग्रह यदि स्थूल बिम्ब वाला हो
तो जयी तथा दक्षिण का सूक्ष्म बिम्ब जित कहा जाता है । उत्तर और दक्षिण दोनों
बिम्ब बराबर हों तो दक्षिण ग्रह जयी तथा उत्तर का जित होता है । शुक्र (का
बिम्ब बड़ा होने के कारण) उत्तर दक्षिण दोनों दिशाओं में जयी होता है ।
सौम्य याम्य स्थितीक्षायै प्रोक्ते दृक् कर्मणी परम् ।
सल्लम्बन नति स्पष्ट खेटतः स्याभूतद् युतिः । ६१ ।
दो ग्रहों में कौन उत्तर और कौन दक्षिण है यह जानने के लिए आयन और
आक्ष से संस्कार की विधि कही जा चुकी है । ग्रहण के समान योग ज्ञान के
लिए भी लम्बन और नत संस्कार आरम्भ से किया जायेगा ।
गण्यतेऽद्धर्दांश भेदो ऽपि भौमादीनां बुधैर्नयत्
प्राग्भिस्तेन दिते तेषा मत्यल्पे नत लम्बने । ६२ ।
प्राचीन आचार्य तारा ग्रहों का आधा अंश अर्थात् ३० कला तक अन्तर की
गणना नहीं करते थे अतः नत और लम्बन (उस से कम होने के कारण छोड़ देते
थे ।
तथापि गणित ज्ञान स्यावश्यकतया मया
परिकल्प्य निगद्येते सद्धियां परितुष्टये । ६३ ।
तथापि गणित ज्ञान के लिए लम्बन और नत संस्कार जानना आवश्यक है
अतः बुद्धिमानों के संतोष के लिए मैने इनके बारे में कहा है । (Academic
interest)
ग्रहों का नति निकालना-