सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह युति वर्णनम् १७७
भौमेज्यार्क भुवां बिम्बाद् विष्टसूर्य फलस्य या
उत्क्रमज्या तया क्षुण्णा द्विगुणत्रिज्यया (६८७६) हृताः । ४५ ।
भास्वर बिम्ब आदि- अभी मंगल गुरु और शनि का जो बिम्ब व्यास कहा
गया उन्हें दो स्थान में रखेंगे । एक स्थान से चौथे शीघ्र फल के निकालने के
समय प्राप्त उत्क्रमज्या से गुणा कर त्रिज्या के दो गुणा (६८७६) से भाग दें ।
तत्फलै रुज्झिताः कार्या बुध भार्गव यो स्तु तौ
द्राक् केन्द्रे मकरादिस्थे लिप्ताः शीघ्रफलोत्थिताः । ४६ ।
फल को दूसरे स्थान में रखे बिम्बवव्यास से घटाने पर उस ग्रह का भास्वर
बिम्ब होगा)
बुध और शुक्र का शीघ्र केन्द्र मकरादि ६ राशि में रहने पर चतुर्थ फल कला
को शीघ्रफल की
कोटि लिप्ताश्च संयोज्य तज्ज्या या त्रिज्यया ज्यया
पुनः कर्कादितत्केन्दे द्राक् फलाढ्य त्रिराशितः । ४७ ।
कोटिकला में जोड़कर योगफल की ज्या अर्थात् स्फुट केन्द्र कोटिज्या को
त्रिज्या में जोड़ेंगे । पुनः बुध और शुक्र का शीघ्र केन्द्र से शीघ्र केन्द्र में तीन राशि
जोड़कर
कोटिराश्यादयः शोध्या शेष दोर्ज्या च यातया ।
बिम्बौ संगुणितौ द्विघ्न त्रिज्या भावित पञ्चते । ४८ ।
उसकी कोटि राशि घटायेंगे । शेष की भुजज्या अर्थात् स्पष्ट केन्द्रज्या निकाल
कर उनके बिम्ब व्यास से गुणा कर त्रिज्या के दो गुणा (६८७६) से भाग देंगे ।
(फल इन दोनों ग्रहों का भास्वर बिम्ब होगा) इस प्रकार पांच तारा ग्रहों का
भवन्ति भास्वरा मध्या स्त्रिभाधिक कला वलेः
क्रमज्यात्रिज्यया युक्ता शुक्रज्ञ गुणको भवेत् । ४९ ।
मध्यम भास्वर बिम्ब आयेगा । यहां शीघ्र फल कला और कोटि कला का
योग तीन राशि से अधिक होने पर उनकी क्रमज्या त्रिज्या में जोड़ने से बुध और
शुक्र का गुणक होगा ।
मध्यास्ते द्विविधा बिम्बा स्त्रिज्याघ्ना वृत्त भास्वरा
मन्द श्रुति हतास्त्रिज्या क्षुण्णा द्राक् कर्णभाजिताः । ५० ।
मध्य वृत्त बिम्ब और मध्यम और भास्वर बिम्ब को अलग अलग रखकर
त्रिज्या से गुणा कर अपने अपने शीघ्र से भाग देने पर स्फुट बिम्ब और भास्वर
बिम्ब होगा ।
स्फुटा भवन्ति यौ स्पष्ट वृत्त बिम्बौ सितज्ञयौ
तौ चक्रार्द्धे शराल्पे त्वे दृश्यौ भास्वती गर्त्त वित् । ५१ ।