सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 609 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 272

ग्रह युति वर्णनम् १७५
कृत्वाऽसकृत् सम कलौ स्यातां तौ ध्रुव सूत्र गौ
ततो धनर्ण कलिका वर्ग युक्तेषु वर्गितः । ३१ ।
इस प्रकार बार बार करने से दोनों ग्रह राशि गुण कला में समान हो जाते
हैं । तब आयन दृक् कर्म कला का वर्ग और शर वर्ग को को जोड़ कर-
पदं स्यात् सूक्ष्म विक्षेप क्रान्ति स्तत् संस्कृता स्फुटा ।
मध्यैव सर्वदा भानो रप मण्डलगस्य सा । ३२ ।
योग का वर्गमूल निकालने से सूक्ष्म शर होता है । सूक्ष्म शर और स्थानीय
क्रान्ति एक दिशा में होने पर जोड़ेंगे, नहीं तो अन्तर कर ग्रह की स्फुट क्रान्ति
निकालेंगे । यह ध्रुव से नाड़ी पर्यन्त ध्रुव प्रोत वृत्त पर अपने खमध्य से चापीय
दूरी होगी । सूर्य क्रान्ति वृत्त में रहने के कारण उसकी मध्यम क्रान्ति ही स्फुट
क्रान्ति होती है ।
स्फुट क्रान्ते श्वरं स्व स्व दिनार्द्धं चोन्नतं न तम् ।
काल मानीय खगयो र्हन्यात् ख ख कृतेषुभिः । ५४००) । ३३ ।
त्रिप्रश्नाधिकार की विधि से दोनों ग्रहों का स्फुट क्रान्ति से उनका चर,
दिनार्द्ध नत तथा उन्नतकाल निकालते हैं । नत और उन्नत काल को ५४०० से
गुणा कर
दिनार्द्धेन भजे ल्लब्ध क लानां ज्ये न तोन्नते
स्यातां मध्य स्फुट क्रान्ति सिद्धयो र्यच्चरार्धयोः । ३४ ।
अपने अपने दिनार्द्ध से भाग देने पर क्रमशः नत और उन्नत काल की ज्या
आती है । ग्रह की मध्यम और स्फुट क्रान्ति के चर प्राणों के अन्तर की कला को
नत ज्या से गुणा कर त्रिज्या से भाग देते हैं ।
सौम्ये क्षेपे हीन युतौ क्रमाद् याम्येयुतो नितौ
कार्यौद ग्रहौ तद् विवरात् काल यातैष्य संज्ञकम् । ३५ ।
कलात्मक फल को उत्तर शर होने पर दिन के पूर्वार्द्ध में ग्रह से घटायेंगे तथा
दिन के परार्द्ध में जोड़ेंगे दक्षिण शर होने पर दिन के पूर्वार्द्ध में ग्रह में जोड़ेंगे तथा
परार्द्ध में घटायेंगे । इस से आक्ष दृक् कर्म संस्कृत ग्रह होगा ।
इस क्रिया के बाद दोनों ग्रहों का अन्तर निकाल कर गत और गम्य काल
निकालेंगे ।
ज्ञात्वास्मादाक्ष दृक् कर्म पौनः पन्यादिति स्थिरौ
कृत्वा पश्ये न्निजे देशे याम्य सौम्यन्तरं तयोः । ३७ ।
इस काल से पुनः उक्त रीति से आक्ष दृक् कर्म बार बार करने पर दोनों
संस्कारों के बाद ग्रह का स्थिर मान आयेगा । इसके बाद ग्रहों का सम प्रोत
वृत्तीय उत्तर दक्षिण अन्तर निकालेंगे ।