सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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विक्षेप केन्द्रज्या को अपने अपने मध्य विक्षेप से गुणा कर चतुर्थ शीघ्र केन्द्र
से भाग देने से स्फुट शर होता है ।
स्थूलोऽयं शर संस्कार सिद्धान्तोक्त रलेखितः
मयोच्यन्ते कुजादीनां दृक् सिद्धयं सूक्ष्म सायकाः । १२ ।
यह शर संस्कार मैने प्राचीन सिद्धान्त के अनुसार लिखा है जो मेरे अनुसार
स्थूल है । अब मेरे वेध से मंगल आदि का सूक्ष्म शर जिस प्रकार दीखता है वह
ज्ञात करने की विधि बताता हूँ ।
मध्यार्क स्थान तो मन्द स्फुटानां द्युषदां यतः ।
विक्षेपाः स्यु स्फुटा भूमि गोलतः शीतगोरवि । १३ ।
जिस प्रकार मध्याह सूर्य के स्थान (खमध्य) से दूर रहने पर सूर्य और चन्द्र
का स्फुट संस्कार होता है (पृथ्वी केन्द्र और भूमि से देखने का अन्तर) उसी प्रकार
अन्य ग्रहों का भी स्फुट शर होता है ।
तन्मध्याः कुजमन्दज्याः शोध्याः स्व स्फुट मन्दतः
ततोऽखिलै र्मान्य फलैः प्राग्वत्कार्या युतोनिताः । १४ ।
मध्यम मंगल, गुरु और शनि को अपने अपने स्फुट मन्दोच्च से घटाकर उनका
शर के लिए मन्दकेन्द्र आयेगा । इस मन्द केन्द्र की ज्या (अर्थात् मन्दफल) निकाल
कर उसे उस मध्यम ग्रह में जोड़ या घटाकर (सम्पूर्ण मन्दफल की तरह) शर के
लिए ग्रह का मन्द स्फुट होगा ।
बुधस्य स्फुट शीघ्रोन्न स्फुट मन्दात् परोच्चजम्
फलं कृत्वोन युक्तेन स्फुटद्भाक् शर शीघ्रकः । १५ ।
बुद्ध मन्दोच्च से शीघ्रोच्च को घटाकर उसका परोच्च (परोच्च केन्द्र फल) निकाल
कर धन ऋण क्रम से पुनः शीघ्रोच्च में जोड़ने या घटाने से शर के लिए उपयोगी
शीघ्रोच्च होगा । शुक्र के शीघ्रोच्च में शर के लिए और कोई सास्कार की आवश्यकता
नहीं है ।
स्यात् सितस्य यथा नीति शर शीघ्रश्चलोच्चकः ।
शरशीघ्राविमावुक्ता मन्द स्पष्ट स्तयश्चते । १६ ।
जिस प्रकार चन्द्रमा का शर के लिए विक्षेप केन्द्र निकाला जाता है । उसी
प्रकार बुध शुक्र, का यह शर शीघ्र विक्षेप केन्द्र हुआ) । अन्य तीन ग्रह मंगल
आदि का विक्षेप केन्द्र (शर शीघ्र) निकालने के लिए उनके मन्द स्पष्ट केन्द्र का
स्वपातैः शोधिताः चेस्युः पातोने ग्रह संज्ञकाः ।
तद् बाहुः शर सिद्ध्यर्थः प्रागुक्ता सौम्य याम्यता । १७ ।
अपने अपने पात से घटाते हैं । शर केन्द्र का भुज निकाल कर उससे शर
साधन होता है । चन्द्र शर के अध्याय (चन्द्र ग्रहण) में इन शरों के उत्तर दक्षिण