सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह युति वर्णनम् १७१
जिन दो ग्रहों का योग या युद्ध कब हुआ या होने वाला है, यह जानने के
लिए इष्ट काल की ग्रह राशि आदि में अन्तर कर उसकी कला बनायेंगे और
अपनी अपनी स्फुट गति कला से अलग अलग भाग करेंगे। दोनों के मार्गी या
दोनों के वक्री होने पर उन्हें ग्रहों की गति अन्तर कला से अलग अलग भाग
देंगे।
द्वयोर्विक्रिण्यस्त्वैक स्मिन् भक्तियोगेन ता भजेत्
लब्ध लिप्तादिकं शोध्यं गति देयं भविष्यति । ७ ।
दो ग्रहों में एक ही वक्री (और दूसरा मार्गी) होने पर उन्हें गति योग से भाग
देंगे)। लब्धि लिप्तादि फल को यदि योग हो चुका है, तो ग्रह की राशि आदि
से घटायेंगे।
विपर्ययाद् वक्र गत्यो रेकन्मिंस्तु धनक्षयौ
समलिप्तौ भवेतां तौ ग्रहै र्भगण संश्रितौ । ८ ।
योग यदि बाद में होने वाला है, तो इस फल को ग्रह की राशि आदि में
जोड़ेगे। दोनों ग्रह यदि वक्री हों तो विपरीत संस्कार करेंगे। (अर्थात् योग बीत
जाने पर योग तथा योग बाकी रहने पर घटायेंगे)। इस क्रिया से दोनों ग्रह की
राशि कला आदि योग के समय समान हो जायेगी।
विवरं तद् वदुद्धृत्य दिनादिफल मिष्यते । इति ।
गत गम्यं ततः प्राग् वत् स्यातां सम कलौ स्थितौ । ९ ।
दोनों ग्रह की अन्तर कला को पहले की तरह गति अन्तर या गति योग से
भाग देने पर गत गम्य (क्रमानुसार) दिन आदि फल आयेगा। एक बार इस प्रकार
करने से यदि ग्रहों की कला समान नहीं होती है। तो फिर से यह क्रिया करते
हैं।
सूर्य सिद्धान्ते-कुजार्कि गुरु पातानां ग्रहवच्छीघ्रजे फलम् ।
वामं तृतीयजं मान्द्यं बुद्ध भार्गव पातयोः । १० ।
मंगल गुरु और शनि के पातमें उनको स्फुट करते समय चतुर्थ कर्म का शीघ्र
फल जिस प्रकार संस्कार होता है उसी प्रकार (धन या ऋण) संस्कार करेंगे ।
बुध और शुक्र के स्फुट करते समय (३ य कर्म के समय) मन्दफल का संस्कार
जैसे करते हैं उसके विपरीत प्रकार से पात में संस्कार करेंगे।
स्वपातो यद् ग्रहा जीवा शीघ्रा भृगुज सौम्ययो । इति ।
मध्येषु ध्नान्त्य कर्णाप्ति विक्षेपाः स्युः स्फुटाः स्वकाः । ११ ।
इसके बाद इन ग्रहों की स्फुट राशि से अपना अपना पांत घटायेंगे। शेष
की ज्या करने से विक्षेप केन्द्र ज्या होगी। बुध और शुक्र को अपने अपने शीघ्रोच्च
से घटाकर शेष की ज्या करने से विक्षेप केन्द्र ज्या होगी।