सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 267, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशः प्रकाश
ग्रह युति वर्णनम्
स्व स्व कक्षासुचरतां खेचराणां दवीयसाम्
लोकै र्दृश्यायुति मुच्यते सदसत्फलात् । १ ।
अपनी अपनी कक्षाओं में नक्षत्र मण्डल में चलते हुए ग्रहों का स्थान पृथ्वी
से एक दिखायी देता है । इस ग्रह युति या युद्ध तथा उनके अच्छे बुरे फल के
बारे में कहा जाता है ।
सूर्य सिद्धान्ते-तारा ग्रहाणामन्योन्यं स्यातां युद्ध समागमो
समागमः शशांकेन सूर्येणा स्तमयः सहः । इति । २ ।
तारा ग्रह (मंगल आदि ५ ग्रह) जब मिले हुए दीखते हैं तो उस एक साथ
आने को ग्रह युति या युद्ध कहते हैं । चन्द्रमा के साथ कोई तारा ग्रह आने पर
उसे समागम कहा जाता है । तारा ग्रह सूर्य के साथ रहने पर वह सूर्य किरण
के कारण नहीं दिखता है उसे अस्त मित कहते हैं । इसे उस ग्रह का अस्त होना
कहते हैं ।
ग्रहौ समकलौ कृत्वा ध्रुवसूत्र समौ ततः ।
स्वदेशे याम्य सौम्ये स्थौ बिम्बार्थं साधये ततः । ३ ।
युति हुए दो ग्रहों का राशि अंश और कला (कदम्बप्रोत वृत्तीय) समान कर
फिर ध्रुव प्रोत वृत्तीय करेंगे (आयन दृक् कर्म द्वारा) इससे दोनों ग्रहों का बिम्ब
शर और लम्बन आदि निकलेगा ।
सूर्य सिद्धान्ते-शीघ्रे मन्दाधिकेऽतीतः संयोगो भवितान्यथा
द्वयोः प्रयायिने रेव वक्रिणोस्तु विपर्ययात् । इति । ४ ।
शीघ्र ग्रह मन्द गतिक ग्रह से अधिक (राशि अंश) या पूर्व होने पर दोनों
ग्रहों का योग हो चुका है । यदि कम हो तो होने वाला है ऐसा समझा जायेगा ।
दोनों ग्रह वक्री होने पर यदि शीघ्र गति ग्रह मन्द गति ग्रह से अधिक है । तो
योग होगा यदि कम है तो योग हो चुका है ।
अवक्रादधिके वक्रिण्येष्यो ऽवक्रेऽधिके गतं ।
मन्द शीघ्र गयो स्त र्क्या वक्र सन्ध्यागतैष्यता । ५ ।
मन्द और शीघ्र गति ग्रह में एक. वक्री और दूसरा मार्गी हो तो मार्गी से
वक्रीग्रह (मन्द या शीघ्र कोई गति का हो) अधिक होने पर योग होगा किन्तु कम