सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· परिलेख वर्णनम् १६९
इस विधि से सूर्य ग्रहण परिलेख करने के लिए उसके बिम्ब के शर के १/३
भाग को दो स्थान में रखकर एक स्थान में तत्कालीन रवि शंकु से गुणा कर
(४४००) से भाग दें तथा लब्धि को पहले स्थान में जोड़ दें ।
अथेष्ट काले फलके ग्रहौ ता प्राक् पश्चिम व्यत्य यतो विलिख्य ।
वेला क्रमावान्मुख मुक्त मध्य प्रदर्शनीयौ न भसीव साक्षात् । ३५ ।
अभीष्ट समय में एक फलक में दोनों चन्द्र और सूर्य ग्रहण लिखेंगे । इसमें
सिर्फ चन्द्र ग्रहण और सूर्य-ग्रहण के समय स्पर्श आदि की दिशा विपरीत होगी
। जैसा ग्रहण हो उसके अनुसार इस फलके द्वारा लोगों को कैसा ग्रहण होगा
यह दिखाया जा सकता है ।
यद् व्याहरत् ग्रहण पान् सदसत् फलाय
वर्णान् वराह मिहिरो निज संहितायाम् ।
पर्वाष्य काल भवमाहुरदोऽद् भुतं यत्
प्राच्यो मयौज्झि तदिहानुप योगि भावात् । ३६ ।
वराह मिहिर ने वृहत् संहिता में तथा अन्य प्राचीन आचार्यों ने भी ग्रहण का
वर्ण, पर्व तथा फल आदि के बारे में अनेक बातें लिखी हैं । इनका गणित कार्य
में कोई उपयोग नहीं होने के कारण ये बातें मैने छोड़ दी है ।
हसन्त मति सुन्दराधर सुवृत्त नेत्र श्रिया
वसन्त शिशु चण्डऋक् शरद खण्ड पाण्डु द्युती
वसन्त मसिता चले विविध देशा लोका कुले
दिशन्त मभयं विभुं भुवन मंगलाक्षं भजे । ३७ ।
जो अत्यन्त सुन्दर अधरों से हंसते है, जिनके पूर्ण गोल नेत्रों की शोभा वसन्त
के प्रातः कालीन सूर्य और शरद काल के पूर्ण चन्द्र की उज्जवल ज्योति को परास्त
करती है, जो नीला चल में रह कर अनेक देशो से आये लोगों के बीच अभय
दान करते हैं । तथा जगत् का मंगल करने के लिए जिनकी दृष्टि है, उन प्रभु
जगन्नाथ की वन्दना करता हूँ ।
इत्युत्कलोञ्जवल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृते गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
सच्छेद को निरगम दशमः प्रकाशः । ३८ ।
इस प्रकार उड़ीसा में विख्यात् राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणना
और दर्शन में समानता के लिए तथा बालकों की शिक्षा के लिए लिखे सिद्धान्त
दर्पण में परिलेख विषयक दशम प्रकाश समाप्त हुआ ।