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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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परिलेख वर्णनम् १६५
बिन्दुओं पर काटती है वहां से ज्या के बराबर स्पर्श और मोक्ष काल के शर का
न्यास करेंगे । जिससे शर की ज्या समास वृत्त को स्पर्श करे । यह शलाका)
चन्द्र ग्रहण के स्पर्श और निमीलन के समय पूर्व तरफ-
पश्चात्दुन्मीलन मोक्षयोश्च तद् युग्म यो स्तिग्मरुचे र्विलोमः ।
शराग्रतो मध्यम बिन्दु गामि सूत्रं स्पृशेद् ग्राह्य तनुञ्च यत्र । १२ ।
तथा उन्मीलन और मोक्ष के समय पश्चिम की तरफ होती है । सूर्य ग्रहण में
यह इसकी उल्टी दिशा में होता है । शराग्र से मध्यम बिन्दु तक रेखा खींचने से
वह ग्राह्य बिम्ब परिधि को जहां काटता है
स्पर्शश्च मोक्षश्च भवेदिहैव शरस्तु तत्काल भवः सदेष्टः ।
तात्कालिकं स्याद् वलनं तथैव तस्या नुसारेण शरः प्रसार्यः । १३ ।
वहीं पर वास्तविक स्पर्श और मोक्ष होगा । यहां शर और वलन हमेशा
उनके तात्क लिक मान के अनुसार किय जाता है ।
स सौम्य याम्यायत सिञ्चनीव तथापि कोणा भिमुखः क्वचिस्स्यात् ।
वदामि मध्य ग्रहयो र्विशेष राहोश्च केतोः स विधस्थ इन्दौ । १४ ।
शर दक्षिण और उत्तर दिशा में होने पर भी कभी कभी आग्नेय आदि कोण
की दिशा में होता है ।
अब चन्द्र सूर्य ग्रहण में मध्य ग्रहण की की बात विस्तार से कहता हूँ । चन्द्र
ग्रहण के समय चन्द्र राहु या केतु के निकट वर्ती होने पर
पञ्चांगुलान्ते वलनात्
ततोऽन्यत् क्रमादुदग् दक्षिणयो निधेयम् ।
विस्पष्ट मेतत् वलनं खवृत्ते प्राच्यां
स्वदिक् स्थंविनिवेश्य तस्मात् । १५ ।
खवृत्त में पूर्व दिग के स्पष्ट वलन अपने दिशा में देना होगा । इस वलन के
अग्र भाग से ५ अंगुल के अन्तर से उत्तर और दक्षिण की तरफ और दो चिह्न है ।
पूर्व सम्पात से उत्तर की तरफ पश्चिम सम्पात में दक्षिण की तरफ) ।
प्रसार्य रेखां किलमध्यविन्दु स्पृशं पराशान्तगतां सितांशोः
ग्रहान्तर्कस्यतु याम्य सौम्य लग्नापमांशांगुल कान्तर स्थम् । १६ ।
इन दो चिह्न और वृत्त के केन्द्र बिन्दु से होकर व्यास रेखा खींचेंगे । सूर्य
मध्य ग्रहण के समय पू र्व दिशा में जो वलन लिया गया था उस अग्र भाग से
उस समय की लग्न क्रान्ति अंश के बराबर अंगुल अन्तर से
बिन्दुं पुरस्ताद् वलना द्वितीय रेखा ततो व्यास मितां प्र सार्य ।
तत्पार्श्वगं मण्डल मध्य बिन्दो र्विन्यस्य याम्योदगिषं तदग्रात् । १७ ।
क्रान्ति दिग के अनुसार बिन्दु देकर इस बिन्दु और मध्य बिन्दु के बीच की