सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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कर त्रिज्या से भाग देते हैं ।
संस्पर्श मोक्षा शुगत दिँगैक्य तदन्तरं भिन्न दिशोस्तुमात्रः ।
शरान्तरं तद् गुणितश्च लब्धाः षट् त्रिंशता (३६) सा इह यष्टि लिप्ताः । ७५ ।
स्पर्श और मोक्ष काल का शर एक दिशा में होने पर इन फलों को अपने
अपने शरों से घटायेंगे, भिन्न दिशा में होने पर जोड़ेंगे । फल को शरान्तर से गुणा
कर ३६ से भाग देने पर यष्टि की लिप्ता होगी ।
तां एव मध्य ग्रहणे स्फुटाः स्युः स्पर्शन्तजा वित्रिभ लग्न भान्वोः
विश्लेष दोः ज्या गुणिता स्त्रिजीवा हृता स्त्रिधा यष्ट य एव मेता । ७६ ।
इनको स्फुट स्पर्श, मध्य और मोक्ष काल के सूर्य से वित्रिभ लग्न के अन्तर
की ज्या से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर यष्टि (तीसरी) मिलेगी ।
परीकृतास्तद् ग्रहकाल हत्या भक्त्या पलै रेव फलै युंतोन ।
लग्ना पमेष्यो पृथगेक दिक् त्वे कमात्रि धौनं समपर्व कालः । ७७ ।
इन तीन यष्टि की परा कर स्पर्श आदि ग्रहण से भाग देकर पलात्मक फल
निकालेंगे । लग्न-क्रान्ति और स्फुट शर भिन्न दिशा में होने पर इसे स्पर्शादि
काल में जोड़ेंगे, अन्यथा (एक दिशा में होने पर) घटायेंगे ।
स्पर्शादि के संस्कृत पर्व नाम्ना स्थाप्यो ऽथ मध्यो निज लम्बेनेन
सुसंस्कृतः स्याद् ग्रहमध्य काल स्तात्कालिक स्पष्ट दिगौसुगस्य । ७८ ।
इस प्रकार वास्तव में स्पर्श, मध्य और मोक्ष काल आयेगा । मध्यकाल को
पुनः स्फुट लम्बन में संस्कृत करने पर ग्रहण का स्फुट मध्यकाल होगा ।
वर्गात्पदं मध्यम यष्टि वर्ग युक्तान् स्वमध्य स्फुट दिक् शरस्यात् ।
ग्रासस्ततः स्पष्टतमः स्वमध्य स्थित्यर्द्ध काल स्फुट काल हत्या । ७९ ।
इसके बाद मध्यकालिक स्फुट शर का वर्ग और मध्य यष्टि वर्ग जोड़कर
उसका वर्गमूल लेने से वह स्पष्टतम मध्यकाल का शर होगा । इससे स्पर्श और
मोक्ष काल का स्थिति अर्द्ध निकालें ।
प्रसाध्य लग्न द्युगुणघ्न मेतं त्रिज्या हृतं संस्कृत पर्वणोश्च ।
कृतान्तिमाद्योः स्वमृणं ततस्तो मोक्षाद्य कालोनिज लम्बनाभ्याम् । ८० ।
इनको अलग स्फुट मध्यकालिक लग्न द्युज्या से गुणा कर त्रिज्या से भाग
दें । प्रथम (स्पर्श काल के ) फल को अपने स्पर्श स्थिति (स्फुट) अर्द्ध से घटायेंगे.,
तथा द्वितीय फल को मोक्ष के स्फुट स्थिति अर्द्ध में जोड़ेंगे । इन दोनों को अपने
लम्बन से संस्कृत करते हैं ।
मानैक्य खण्डात् त्रिकला धिकेऽकेपि मध्य ग्रहस्पष्ट शरे कदाचित्
लग्नापमार्कार्पम भूरि भावात् सूर्य ग्रहः स्यात् क्रिययानयैव । ८१ ।