सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूर्य ग्रहण वर्णनम् १५९
इस प्रकार वास्तव में स्पर्श, मध्य और मोक्ष काल आयेगा । मध्यकाल को
पुनः स्फुट लम्बन से संस्कृत करने पर ग्रहण का स्फुट मध्यकाल होगा ।
वर्गात्पदं मध्यमयष्टिवर्ग युक्तात् स्वमध्य स्फुट दिक् शरस्यात् ।
स्थित्यर्द्ध मानीयततः स्वलग्न द्युज्याहतं व्यास दलोद्धृतं तत् । ६९ ।
इसके बाद मध्यकालिक स्फुट शर का वर्ग और मध्य यष्टिवर्ग जोड़कर
उसका वर्गमूल लेने से वह स्फुट मध्यकालिक शर होगा । इससे पूर्व रीति से
स्पर्श और मोक्षकालिक स्थिति अर्द्ध निकालेंगे । उनको अलग अलग स्थान में
स्फुट मध्यकालिक लग्न द्युज्या से गुणा कर त्रिज्या से भाग दें ।
स्पर्शान्त बाण द्वितीयैक दिक्तवे तद् हीनयुक्त संस्कृत पर्वयुग्मम् ।
स्पर्शान्तज कार्य मथान्य दिक़्ते स्थित्यर्द्ध योगार्द्ध वियुग् युतं तत् । ७० ।
स्पर्श और मोक्ष क्त शर एक दिशा में रहने पर स्पर्श संस्कृत पर्व काल से
प्रथम फल घटायेंगे और द्वितीय फल को मोक्ष संस्कृत पर्व काल में जोड़ेंगे । स्पर्श
और मोक्ष शर भिन्न दिशा में होने पर स्पर्श और मोक्ष स्थिति अर्द्ध के योगार्द्ध
को स्पर्श और मोक्ष संस्कृत पर्वकाल में क्रमानुसार घटायेंगे, और जोड़ेंगे ।
पर्वद्वयं लम्बन संस्कृतं चेत् स्पर्शे विमोक्षे समयः स्फुट स्यात्
स्थित्यर्द्धकेतु ग्रहणार्र्द्ध लग्न द्युज्याहते त्रिज्यकया विभक्ते । ७१ ।
इन दोनों को पुनः अपने अपने लम्बन से संस्कृत करने पर स्पर्श और मोक्ष
काल वास्तव में स्फुट होता है । किन्तु स्थित्यर्द्ध को मध्य ग्रहण काल की द्युज्या
से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देना होगा ।
पर्वान्तजं लम्बन मर्कतः स्यात् स्थित्यर्द्ध युग्मो न युतेतु दर्शं
तात्कालिकेन्दो रसकृद् सकृद्वा तल्लम्बने स्पार्शिक मौक्षिकेस्तः । ७२ ।
पर्वान्तकाल का लम्बन तात्कालिक रवि से निकाला जाता है । स्पर्श और
मोक्ष काल में तात्कालिक चन्द्र से स्पार्शिक और मौक्षिक लम्बन निकालना
चाहिये । यह एक बारम्बार रीति से किया जा सकता है ।
मध्यात् शरात् स्पार्शिक मौक्षिके व्यो यैत्रैक भानो ऽ ध्यधिकस्तथैक
वदामि तत्रापि पुनर्विशेष मसम्भवेऽपि ग्रहणं यतः स्यात् । ३७३ ।
रवि के मध्यकाल शर से स्पार्शिक और मौक्षिक शर में एक अधिक है ।
और एक बराबर है उसके लिए भी विशेष विधि कहता हूँ । जिसके बिना ग्रहण
साधन असम्भव है ।
निष्पाद्य सूर्य ग्रह मुक्त रीत्या स्पर्शान्त मध्य स्फुट सायकायै
ते स्व स्व लग्ना पम संयुतार्क क्रान्ति ज्यायाघ्न त्रिगुणेन भक्ताः । ७४ ।
उपर्युक्त विधि से सूर्य ग्रहण निकाल कर स्पर्श, मध्य और मोक्ष काल के
स्फुट शर को अपने अपने समय के लग्न के क्रान्ति ज्या से अलग अलग गुणा