सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूर्य ग्रहण वर्णनम् १६१
मानैक्यखण्ड (दोनों निम्बकला के योग का आधा) से मध्यग्रह का स्पष्ट शर
३ कला से ज्यादा अधिक हो तो तथा लग्न क्रान्ति से सूर्य क्रान्ति ज्यादा हो तो
सूर्य ग्रहण का साधन इसी क्रिया से होता है ।
मध्यः शरः स्पर्शज मोक्ष जाभ्या मल्पे सताभ्यामधिकं श्रयत्र
तुल्ये भवेद् वा न्यतरेण तत्र नेयं क्रिया किन्तु पुरो दितैव । ८२ ।
मध्य शर यदि स्पर्श और मोक्ष काल दोनों के शर से कम हो, दोनों से अधिक
हो या दोनों के बराबर हो तो पहले वाली विधि का ही व्यवहार करना चाहिये ।
दृग् गोचरं यद् ग्रहणं द्वयं तद् ग्राह्यं न चा दृश्य मितं क्रियार्हम्
अतो दिने चन्द्र मसो निशायां रवेस्त दिष्टं न हि सम्भवेऽपि । ८३ ।
जो ग्रहण दृग् गोचर (अपने स्थान से दिखता है) उसी को ग्रहण (सूर्य या
चन्द्र का) माना गया है । जो नहीं दीखता है उसमें किसी क्रिया (अनुष्ठान) की
आवश्यकता नहीं है । अतः दिन का चन्द्र ग्रहण या रात्रि का सूर्य ग्रहण (गणित
के अनुसार) होने पर भी वह ग्राह्य नहीं है ।
दिने निशायां रवि चन्द्रयो र्ग्रहद्वयस्य भागो यदि दृश्यते ऽ ल्पकः
तदा विधिस्तावद शेष कालके निषेध उक्तो ग्रहणोभिप्तः स्मृतौ । ८४ ।
लेकिन दिन के समय अल्प (आंशिक) दीखता सूर्य ग्रहण तथा रात्रि के
समय अल्प दीखता हुआ चन्द्र ग्रहण के समय स्नान दान आदि करणीय तथा
पाक आदि कर्म निषिद्ध है । ऐसा स्मृति में कहा है ।
अभीष्ट कालाद् प्रसनं पिधान तो यथैव कालः कलितोऽयनाक्ष के ।
यथोदिते तद् वलने पुरा तथा विधेय मत्र किल कर्म निर्मलम् । ८५ ।
चन्द्र ग्रहण में जिस प्रकार इष्ट काल से ग्रास मान तथा ग्रास मान से इष्ट
काल तथा अक्ष और आयन वलन निकाला जाता है । उसी प्रकार सूर्य ग्रहण में
भी सब क्रिया होती है ।
अन्त्या श्रन्द्र ग्रहे स्युः समय विघटि का पूर्णगोड र्था (५९०) विमर्दे
रामाद्र्यक्षोणि (२७३) सूर्य ग्रहण समय जाः अक्षि रामर्तवोन्त्याः (६३२) ।
ग्रसेस्युः कंकणाख्ये द्विरद जलधय (४८) स्तद् विमर्देऽ ग्नि पक्षा । (२३)
वृद्धौ ताः सूक्ष्मतिथ्याः शर गगनकृता पादोनसप्तर्तवः (४०५) । ८६ ।
चन्द्र ग्रहण की स्थिति सर्वाधिक (५९०) पल । चन्द्र ग्रहण का परम मर्दकाल
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