सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 609 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 255

१५८ सिद्धान्त दर्पण
अन्तर के मूल के पहले की तरह (चन्द्र ग्रहण अध्याय की विधि से) गुणा
और हार के प्रयोग से वलय ग्रास का पल आदि स्थिति अर्द्ध निकालेंगे । इस
स्थिति अर्द्ध बल को लम्बन संस्कार कर समपर्व काल से घटाने या जोड़ने पर
वलय ग्रास का आरम्भ और शेष काल होगा)
क्वचिद् ग्रहे दण्डपल प्रभेद मालोक्य यं जिष्णु सुतो जगाद
तिथ्यन्त नाड़ी नत बाहु मौर्व्यैत्याद्यं ससिद्धान्त उदा जहार । ६३ ।
ग्रहण के दण्ड पल गणना से दृष्टि का अन्तर देख कर ब्रह्मगुप्त (जिष्णु गुप्त
के पुत्र) ने अपने सिद्धान्त में तिथि के अन्त में नाड़ी, नंत के भुज और ज्या आदि
के संस्कार कहे हैं ।
यद् भास्करस्तन्नत सिद्ध पर्व न सर्वदा दृक् समतां यदेति
ततोऽधिकं किञ्चिदहं विशेषं ब्रुवे दुरुहे मिहिर ग्रहोऽपि । ६४ ।
भास्कराचार्य ने भी अपने सिद्धान्त शिरोमणि में विधि बतायी है । उससे
ग्रहण काल दृक सिद्ध सदा नहीं होता है । अतः मैने सूर्य ग्रहण के कठिन विषय
पर उससे अधिक बहुत कुछ कहा है ।
निष्पाद्य सूर्य ग्रह मुक्त रीत्या स्पर्शान्त मध्यस्फुट सायकाय
तेस्व स्वलग्नापम शिञ्जिनीघ्ना स्त्रिज्योद्धृता यष्टयएव लब्धा । ६५ ।
पूर्वोक्त नियम से सूर्य ग्रहण साधन कर स्पर्श मध्य और मोक्ष काल के स्फुट
शर को अपने समय के लग्न क्रान्ति ज्या से अलग अलग गुणा कर त्रिज्या (३४३८)
से भाग देने पर उस उस समय की यष्टि होती है ।
परीकृतातद् ग्रह कालिहत्या भक्ताः पलैरैव फलैर्युतोनः
लग्नापमेभ्योः पृथगेक दिक्ते क्रमात्रिधोक्तः समपर्वकालः । ६६ ।
इन तीन यष्टि की परा (विकला का १/६०) को स्पर्श आदि ग्रहण काल हार
से भाग देकर पल आदि फल निकालेंगे । लग्न क्रान्ति और स्फुट शर भिन्न दिशा
में होने पर इस पलात्मक फल को स्पर्शादि काल में जोड़ेगे अन्यथा घटायेंगे ।
तब वास्तव स्पर्श, मध्य और मोक्षकाल होगा ।
क्रमाल्प कश्चेत् ज्ञपुनः पलैस्तैः स्वलम्बनज्या गुणितैः परास्तैः
युतो निता वित्रिभ लग्न पश्चात् पूर्वस्थितेऽर्क नतु वर्द्धमानः ६७ ।
यह समय पहले के समय से अधिक होने पर वही वास्तविक समय होगा ।
पूर्वसमय से कम होने पर पुनः उनको अपनी अपनी लम्बन ज्या से गुणा कर
पूर्वोक्त पर से भाग देकर पलादि फल निकालेंगे । सूर्य वित्रिभ लग्न के पश्चिम
रहने पर स्पर्शादि काल में जोड़ेगे । नहीं तो घटायेंगे ।
स्पर्शादिके संस्कृत पर्वनाम्ना स्थाप्योऽथमध्यो निजलम्बनेन
सुसंस्कृत स्याद् ग्रह मध्यकाल स्तात्कालिक स्फुट दिशा शृगस्य । ६८ ।