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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 609 में से

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पृष्ठ 254

सूर्य ग्रहण वर्णनम् १५७ .
पलान्तरं वर्गित मेतदाप्त मध्य स्थिताद्धोत्थ पलैः फलेन
युक्तं स्फुटं स्यात् यदि दण्डतोल्यं स्थित्यर्द्धमत्पं शफलाढयमेव । ५७ ।
प्रथम लम्बन संस्कार के बाद स्पर्श और मोक्ष काल की स्थिति अर्द्ध और
प्रथम स्थिति अर्द्ध में जो पल आदि अन्तर होगा उनके वर्ग को मध्य स्थिति अर्द्ध
से भाग देने पर जो लब्धि होगी उसे स्पर्श और मोक्ष के स्थिति अर्द्ध में जोड़ने
से वह स्फुट होता है ।
स्थित्यर्द्ध १ दण्ड से कम होने परही यह क्रिया होती है । और भागफल सदा
जोड़ा जाता है । इस स्थिति अर्द्ध से फिर उससे स्पर्श और मोक्ष काल का संस्कार
कर उन्हें स्फुट किया जाता है ।
साध्यं ततो लम्बन मेक बारं चेन्मध्यमेन स्थिति खण्डकेन
ऊने युते लम्बन भाजिदर्शं मानै कखण्डा दधिकः शरःस्यात् । ५८ ।
लम्बन संस्कृत दर्शान्त (अमावास्या) से मध्यम स्थिति घटाने या जोड़ने से
जो स्पर्श या मोक्ष काल होता है । उस समय के स्फुट शर यदि मानै क्यार्द्ध
(बिम्बमानों के योग का आधा) से अधिक हो-
समोऽपिवा तेन तदात्मबाण मध्यग्रहेष्वन्तर लिप्तिकाभिः
मध्य ग्रह ग्रास कलाघ्न मध्य स्थित्यर्द्ध कालस्य दलं विभक्तम् । ५९ ।
या उसके समान हो तो मध्य स्थिति अर्द्ध को ग्रास कला से गुणा कर उसका
आधा करते हैं । उसमें तत्कालिक शर और स्फुट पर्वकालिक शर की अन्तर कला
से भाग देते हैं ।
फलं सकृत् कर्मत एव सिद्धं स्थित्यर्द्धकं मौक्षिक मादि मं वा
तत्संस्कृतात् पर्वण एक मेवस्या ल्लम्बनं स्पष्टमतः शरश्च । ६० ।
इससे एक ही बार में स्पर्श और मोक्ष स्थिति अर्द्ध सिद्ध होते हैं । इन दो
स्थिति अर्द्ध से संस्कृत स्फुट पर्व काल से एक ही बार में स्पष्ट लम्बन निकलता
है । इस लम्बन संस्कृत स्पर्श और मोक्षकाल से स्फुट शर निकलेगा । इस रीति
से बार बार लम्बन निकालने की आवश्यकता नहीं है ।
तमोऽधिकं चेत् सदन प्रमाणं ग्रासस्तु यस्य वलयाभिधानः
तस्मिन् स्तमो मादविहीन मान योगार्द्ध वर्गात् शरवर्ग हीनात् । ६१ ।
सूर्य ग्रहण से ग्राह्य बिम्ब का परिमाण तम (ग्राहक बिम्ब) से अधिक होने
पर वलय ग्रास होगा । ऐसा होने पर ग्राह्य और ग्राहक मानैक्यार्द्ध (बिम्ब मान
योग का आधा) से ग्राहक मान घटाकर अवशेष का वर्ग कर उससे स्फुट शर
का वर्ग घटाते हैं ।
मूलं पुरोवद् गुण हार हेतोः पलात्मकः स्याद् वलयार्द्ध काल
तदून युक्तात् समपर्वणः तत् आरम्भ नाशावपि लम्बनाध्यम् । ६२ ।