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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 609 में से

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पृष्ठ 207

११० सिद्धांत दर्पण
समय निकालने के लिए अपने शरीर को भी शंकु मानकर छाया के अग्र
भाग को निर्दिष्ट स्थान में रखकर पाद मध्य से उनकी दूरी नापी जायेगी ।
मृत्पिण्डं वा स्वनयन समोच्चाभ्रके विभ्रदेतद् -
भायां चिह्नं किमपि विदधत् स्वांगु लिभ्यांत्यजेत्तम् ।
यत्रैवासौ निपतति ततो यावदंकं प्रमातात्
नेत्रोञ्चद्वादश लवमितै रंगुलैर्भा भवेत्तु । १२ ।
अपनी आंख तक की ऊंचाई का मृत्पिण्ड या स्तम्भ खड़ा कर उसका छायाग्र
जहां होगा वहां चिह्न देकर उस स्तम्भ को छाया पर रखेंगे । यह पिण्ड अपनी
छाया की दिशा में मूल से जितना दूर पड़ेगा, वहां से बाकी छाया की दूरी
मापेंगे । इसके लिए स्तम्भ (नेत्रतक की ऊंचाई ) का १/१२ भाग १ अंगुल गिना
जायेगा । पिण्ड तथा उसके बाद माप का जोड़ ही छाया का पूरा परिणाम होगा ।
छाया यस्मात् दिनकर तनु मध्य विन्दोः सदेशा
तद्बिम्बान्ते क्षण भुवि तमोऽभावतः सा न दृश्या ।
तस्मात् कर्ण क्षिति विधु भुजां (२११) शेन युक्तैवकार्या
यद् बिम्बार्द्धं शिवभुज (२११) गुण मध्यंकर्णोऽरुणस्य । १३ ।
यहां जिस छाया से बारे में कहा जा रहा है वह सूर्य बिम्ब केन्द्र से उत्पन्न
शंकु की छाया है । लेकिन जो रेखा छायाग्र तथा शंकु अग्र के बीच खींची
जायेगी वह सूर्य के केन्द्र बिन्दु से होकर नहीं जाती । क्योंकि सूर्य बिम्ब के केन्द्र
के अलावा बाकी भागों की अन्धकार पूर्ण नहीं है । उनसे भी छाया बनती है ।
अतः सूर्य केन्द्र की छाया की लम्बाई निकालने के लिए शंकु छाया में उसका
१/२११ अंश जड़ते हैं । क्योंकि पृथ्वी से सूर्य की दूरी सूर्य व्यासार्द्ध का (२११)
गुणा है ।
शंकुर्नरः कोटि रूदीरितोऽत्र छाया प्रभारूया भुजइत्यिभिज्ञैः ।
श्रुत्यारूय मेतत् कृति योग मूलं क्षेत्रं निरुक्तं खलु कर्म भूमिः । १४ ।
शंकु को नरया कोटि भी कहा जाता है । प्रभा और भुज् छाया को कहते
हैं । भुजवर्ग और कोटि वर्ग का योग कर उसका मूल होने से कर्ण होता है ।
इस कोटि, भुज तथा कर्ण से मौलिक (समकोण ) त्रिभुज होता है ।
प्राक् पश्चात् खार्द्ध गारेखा सममण्डल मुच्यते ।
निरक्षोर्द्वागता या सा विषुवन्मण्डला भिधा । १५ ।
जो वृहत् वृत्त (गोल का सबसे बड़ा वृत्त जिसका केन्द्र गोल का केन्द्र होता
है, यह गोल सतह की सरल रेखा है) पूर्व से पश्चिम खस्वस्तिक होकर जाता है
उसे पूर्वापर वृत्त कहते हैं । पृथ्वी के विषुव का विस्तार करने पर आकाश विषुव
होता है । इसका भी अक्षांश शून्य माना जाता है ।