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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

१०८ सिद्धान्त दर्पण
दिया जाता है ।
याम्योत्तरांक परि यद्वलयद्वयोत्थ मीनेन वासव जलाधिपयो र्दिशौस्तः ।
दिङ्मध्य सूत्र कृत वृत्त चतुष्टयोद्य मीनै र्भवन्ति विदिशोऽन्तरजाश्चतस्रः । ५ ।
दक्षिणोत्तर दिशा को दोनों दिशा में बढ़ा दिये पर यह वृत्त को परिधि पर
उत्तर और दक्षिण बिन्दु पर मिलेगा । केन्द्र बिन्दु से इसके ऊपर लम्ब खींचने पर
पूर्व और पश्चिम बिन्दु मिलेगा । पूर्व, पश्चिम, दक्षिण उत्तर दिशा जानने के बाद
कोण जानने के लिये दो निकट की दिशाओं के बीच के चाप को दो भाग करेंगे ।
शङ्कुच्छाया कृति युति पदं कर्ण इत्युच्यते तद्
वर्गाच्छं कोः कृति (१४४) विरहिता त्स्युत्पदं भा प्रभायाः
वर्गेणोनात्पदमपि नरः शंकुमे कोटिबाहू
तद् युग्माग्रान्तर मभिहतं कर्ण संज्ञं सुधीरैः । ६ ।
शंकु वर्ग और छाया वर्ग का योग का मूल निकालने से कर्ण होता है । कर्ण
वर्ग से शंकु का वर्ग (१४४) घटाकर उसका मूल निकालने से छाया (जिसे कोटि
कहते हैं) होती है । कर्ण वर्ग से कोटि वर्ग घटाने पर मूल करने