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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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सूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् १०३
अशुद्ध राशि (अपूर्व राशि) के उदय असु से भाग देने पर अंशादि फल होगा
उसे ३० से घटायेंगे । अभुक्त राशि के पहले की राशि में शेष जोड़कर सायन
मध्य लग्न होगा । उसमें विपरीत भाव से अयन संस्कार करने से
संस्कृतं मध्य लग्नः स्यान्मध्य भं खार्क इत्यपि
यदि पश्चान्नतः कालस्तदा सायन भास्वतः । १४७ ।
स्पष्ट मध्य लग्न होगा । इसे दशम लग्न या मध्यार्क भी कहते हैं । नतकाल
पश्चिम होने पर (दिनार्द्ध के बाद जितना समय बीत चुका है वह पश्चिम नत है)
नत काल से सायन रवि की राशि का
भोग्य भांश निरक्षासु नूर्ध्व मध्य भजानसून्
प्रोज्भ्या शुद्धनत प्राणान् हत्वा गगन वह्निभिः (३०) । १४८ ।
विषुव मान से भोग्य काल घटायेंगे। फिर क्रम से अगली राशियों का विषुव
उदयमान घटायेंगे । अशुद्ध राशि के शेष (जिससे उस राशि का उदय मान नहीं
घटे) को राशि के उदयासु से भाग दे ३० से गुणा करेंगे ।
हत्वा तल्लग्न प्रागैर्लब्धां साध्यं भ पूर्वकम् ।
विलोम संस्कृतं चेत्स्या च्चलांशै र्मध्यमं हितत् । १४९ ।
फल में पूर्ण भुक्त राशियां जोड़ कर उससे अयनांश घटाने से मध्य लग्न
आयेगा ।
प्राक् पश्चात् सायनार्कोत्थ भुक्त भोग्य सुतोयदि
अल्पानता सवस्तत्ते त्रिंशद्घ्ना स्तद् भजासुभिः । १५० ।
पूर्व या पश्चिम नत निकालते समय यदि नत काल सायन रवि के भुक्तया
भोग्य असु से कम हो तो उसे ३० से गुणा कर उसी राशि के उदया सु से भाग
देते हैं ।
उद्धता लब्ध भागाद्यैः प्राक् पश्चान्नतयोरविः ।
हीन युङ् मध्य लग्नः स्याद् दिनार्द्धे स्फुट एव सः । १५१ ।
लब्धि अंश आदि को पूर्व नत में रवि से घटायेंगे और पश्चिम नत में जोड़ने
से मध्य लग्न होगा । दिनार्द्ध के समय स्फुट सायन रवि ही मध्य लग्न होगा ।
इष्टेष्यो दय जान्तरासु गुणिताः प्राच्यश्रलां शादयः ।
खाग्न्याप्ताः (३०) फल हीन युक् स्व उदयः स्यादेष्य ऊनेऽधिके ।
यातेष्टान्तर निघ्न खाग्नि (३०) विहृत प्रत्यक् भगणैः गते ।
लग्नेऽल्पेऽधिक ऊनयुक् स्वक इति स्याल्लग्नजातः स्फुटम् । १५२ ।
राशि का निरयन उदयासु निकालने की प्रणाली-अयनांश पूर्व की तरफ गति
होने भचक्र पूर्व की तरफ घूमने) पर इष्ट राशि और उसके बाद की राशि की
उदयासु के अन्तर में अयनांश से गुणा कर (३०) से भाग देते हैं । इष्ट राशि, का