सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ सिद्धान्त दर्पण
राशि अंश कलादि होगा ।
इष्ट कालासवोऽल्पाश्चेत् प्रश्नतस्त्रिंशदाहताः
लग्नाप्ता सायनाकार्ढ्या व्ययनाः स्यात्तनुः स्फुटाः । १४० ।
भोग्य असु से इष्ट काल कम होने से उसी भोग्य असु को ३० से गुणा कर
सायन स्फुट सूर्य के उदय असु से भाग देने पर जो अंश आदि आयेगा उसे सायन
स्फुट रवि में जोड़कर उससे अयनांश घटाने पर स्फुट लग्न आयेगा ।
चलांश संस्कृत स्पष्ट लग्न भुक्तांश लिप्तिकाः ।
तन्मान घ्नाः खरामाप्ताः स्थाप्या भुक्तासवस्ततः । १४१ ।
अयनांश संस्कृत लग्न के भुक्त अंश आदि को उसी राशि के उदय मान से
गुणा कर ३० से भाग देने से भुक्त असु होगा ।
अधोऽधो लग्नमानाढ्याः सायनार्कस्य भोग्यकैः ।
लग्नासुभिर्युतास्ते स्यु रिष्ट कालासवस्तनोः । १४२ ।
इसमें सायन सूर्य (उदय काल के) के बाद लग्न तक की पूर्ण राशियों का
उदय असु जोड़ेंगे । सायन सूर्य का भोग्य असु भी इससे जोड़ेंगे । प्राप्त असु
सूर्योदय के बाद का इष्ट काल होगा जिस समय वह लग्न उदय होगा ।
दशम लग्न का नियम
मध्य लग्नोऽपि संसाध्यो निरक्षोदयजासुभिः ।
स्वदिनार्द्धान्नत प्राणाः प्राच्याञ्चेत् चण्ड दीधितेः । १४३ ।
निरक्ष (विषुव स्थान) में राशियों के उदय मान से ही मध्य लग्न का भी
साधन किया जाता है । दिनार्द्ध के पहले रवि जितने समय पूर्व में रहता है
(दिनार्द्ध समय इष्ट काल) उसे पूर्व नत काल कहते हैं ।
चलांशैः संस्कृतस्यैव भुक्त राश्यंशजा सवः
व्यक्ष देश भवा येस्युर्नता सुभ्यो विवर्जिताः । १४४ ।
पूर्वनत काल (असु में ) से सायन रवि जिस राशि में हो उस राशि का
विषुव स्थानीय उदयमान अनुसार भुक्त नत असु (राशि के भुक्त अंशों से) घटायेंगे ।
ततो येराशयोऽधोऽध स्तत्प्राणाः प्रति लोमतः
शोध्या स्वशुद्धा असव स्त्रिंशद् घ्नाः पूर्व लग्नजैः । १४५ ।
अवशेष से उसके पूर्व राशियों के उदय असु उल्टे क्रम से घटायेंगे । शेष
जो असु होगा (जिस से पूर्व राशि का उदय असु नहीं घटे) उससे ३० से गुणा
कर ।
प्राणै र्हताः फलांशाद्यं शोधितं त्रिंशदं शतः
यत्स्याद् गृहादिकं तच्च व्युत्क्रमाञ्चल भागकैः । १४६ ।