सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ सिद्धान्त दर्पण
उदयाशु बाद की राशि के उदयासु से कम होने पर फल को इष्ट राशि के उदयासु
में जोड़ेगे अन्य था अधिक होने पर घटायेंगे ।
अयनांश (भचक्र) पश्चिम की तरफ गति होने के पर उस राशि और उससे
पहले की राशि के उदयासु के अन्तर को अयनाश से गुणा कर ३० से भाग देते
हैं । फल को इष्ट राशि का उदयासु उसके पहले की राशि के उदयासु से कम
होने पर जोड़ेगे अन्यथा घटायेंगे ।
पश्चात् प्रागयनांश केषु तनवो व्यक्षे
चरा (१।४।७।१०) द्वयात्मकाः (३,६,९,१२)
साक्षे मेष घटौ युवत्यनिमिषौ देशे स्थिराः स्युः क्रमात्
इत्थं संस्कृत लग्न मानवशतः स्वाभीष्ट दिष्टे स्फुटी-
कार्याश्चैत्तनवस्तदायन लवैर्नाद्यन्तयोः संस्कृतिः । १५३ ।
अयन (भचक्र) की पश्चिम की तरफ गति होने पर चर राशि (मेष, कर्क, तुला
और मकर ) का सायन और निरयन उदय परिमाण विषुव देश में समान हैं ।
अन्य स्थानों में भी मेष और तुला का सायन और निरयन उदयमान समान है
(इनके पूर्व की राशि का उदय मान समान होने के कारण उदयासु का अन्तर
नहीं होता) ।
अयन (भचक्र ) की पूर्व की तरफ गति होने पर द्वि स्वभाव ( मिथुम, कन्या,
धन, मीन) राशियों का विषुव पर तथा कन्या और मीन राशियों का अन्य स्थानों
में सायन और निरयण उदय मान समान होंगे । (इनके पीछे की राशि का उदयमान
समान होने के कारण अन्तर नहीं होता)।
रामाःषड् विशिखै (३।५६) कृताः कृतभुजै (४।२४) रर्थाः
स्वरैः (५।७) सायका भूभृद् वह्निभि (५।३७) राशुगाः
कृतगुणै (५।३४) र्बाणाश्च पक्षाक्षिभिः (५।२२)
औड्रे भार्द्धयुगे क्रमोत्क्रम वशात् स्युर्लग्न दण्डाः पलैः
सम्प्रत्यक्षि भुजानांश कलनात् कथ्यन्त एतेस्फुटाः । १५४ ।
उत्कल के मध्य में निरयन राशियों का लग्नोदय मान दण्ड और पल में क्रम
से इस प्रकार हैं-मेष (३।५६)वृष (४।२४), मिथुन (५।७), कर्क (५।३७)सिंह
(५।३४) कन्या (५।२२) उल्टे क्रम से दूसरे चक्रार्द्ध तुला आदि का है । अव २२°
अयनाश के अनुसार सायन उदयासु कहे जाते हैं ।
वेदाग्रावकुभिः (४।१७) कृतारसशरै (४।५६) र्बाणाश्च
नन्दाक्षिभि (५।२९) र्बाणाबाणगुणैः (५।३५) शराः शर भुजै
(५।२५) रर्थाश्चनेत्राक्षिभिः (५।२२) र्बाणा रूपगणैः (५।३१) शरारस
गुणै (५।३६) रर्थाः पृषत्केन्दुभिः (५।१५) वॅदाबाणगुणैः (४।३५)
कृताश्च शिखि भी (४।३) रामारसार्थैः (३।५६) क्रियात् । १५५ ।