सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्ष्म पञ्जिका क्रान्त्यादि वर्णनम् १०१
विषुवत रेखा के उदय असु या मध्य लग्न (माध्यन्दिन रेखा पर करने का
समय) निकालने पर अपने स्थान के चर खण्डों से संस्कार कर अपने स्थान का
उदयासु प्रत्येक राशि का निकालते हैं ।
यावतोदेति कालेन राशिरेतस्य सप्तमः ।
ताववास्तमयं याति स्थूलेयं क्षेत्र कल्पना । १३४ ।
स्थूल गणना या अनुमान के अनुसार पूर्व में जो राशि उदय होती है उसी
समय पश्चिम में उसकी सप्तम राशि अस्त होती है ।
होरा दृक् काणयोः कालः पूर्ववत् साध्यते हियः ।
राश्यार्द्धत्रिलवक्रान्ति द्युज्याभिः सतु सूक्ष्मकः । १३५ ।
होरा (राशि का आधा १५ अंश) द्रेकाण (राशि का १/३ अर्थात १० अंश का
उदयमान भी राशि के उदयमान की तरह निकाला जायेगा । इसके लिए प्रति
राशि अर्द्ध या १/३ राशि की क्रान्ति द्युज्या निकालनी होगी अतः यह गणना राशि
उदय से अधिक सूक्ष्म होगी ।
चलांश संस्कृतः सूर्यो वर्तते यत्र मन्दिरे ।
तद् भोग्यां शादयो निघ्नस्तल्लगन प्रमिता सुभिः । १३६ ।
औदयिक स्फुट रवि का अयनांश संस्कार करें । वह जिस राशि में है इसका
भुक्तांश और भोग्यांश निकालें । भोग्यांश को उस राशि के उदय मान से गुणा
कर ।
खरामै (३०) विर्हता लब्धाः प्रश्नाख्यास्तेऽसवोमताः ।
इष्ट कालासुतः शोध्या स्ततस्तदपरोदयाः । १३७ ।
३० से भाग देने पर भोग्य असु (या प्रश्न असु) आते हैं । इसको सूर्योदय के
बाद इष्ट काल से घटाते हैं । शेष से उसके बाद की राशियों के उदय काल
क्रमानुसार घटाते हैं ।
शोध्यास्त्वशुद्ध लग्नस्य भुक्त प्राणाः खवह्निभिः (३०)
क्षुण्णा अशुद्ध मानाप्ता भागाद्या गता भान्विताः । १३८ ।
अन्तिम शेष (जिससे अगली राशि का पूर्ण उदय मान न घट सके) को ३०
से गुणा कर उस राशि से उदय मान से भाग देने पर इस राशि का अंश आदि
आयेगा । इसमें गत राशि संख्या मिलायेंगे । तो सायन लग्न आयेगा ।
संस्कृता वैपरीत्येन चलांशैर्भवति स्फुटः
लग्नः स्वदेश संसिद्धौराशि भाग कलादिभिः । १३९ ।
सायन लग्न में अयनांश का स्फुट से विपरीत संस्कार करेंगे । (स्फुटराशि
में यदि जोड़ा था इससे घटायेंगे । ) शेष अपने स्थान के इष्ट समय के लग्न का