सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० सिद्धान्त दर्पण
दूसरी विधि में परम अल्प द्युज्या (३ राशि ९०° का) (३१५३) को तीन स्थानों
पर क्रम से ३,२,१ राशि की ज्या (३४३८।२९७८।१७१९) से गुणा करने पर
(१०,८४०,०१४।९३,८९,६३४।५४,२०,००७) आयेगा । इसे क्रम से अपनी अपनी
३,२,१ राशि की द्युज्या ( ३१५३।३२२७।३३६९) से भाग देने पर जो फल होगा
उनका चाप निकालें (५,४००।३,४७१।१,६७५) जो क्रम से ३,२,१ राशि का उदयासु
है ।
त्रिभासुभ्योद्वि भ प्राणाः शोध्या एक भजास्ततः
भुज त्रिद्वयेक राशीनां भवेयुरुदयासवः । १२८ ।
तीन राशि असु से २ राशि का असु, २ राशि के असुसे १ राशि असु घटाने
पर क्रमशः ३ य और द्वितीय राशि का उदयासु मिलेगा । प्रथम राशि का पहले
ही ज्ञात है ।
पञ्चाद्रि भूपा (१६७५) स्तर्काकं घना
: (१७९६) नन्दाक्षिगोभुवः (१९२९)
नन्दाक्षिगोभुवो (१९२९) ङ्कांक घनाः (१७९६)
पञ्चाद्रिषड् भुवः (१६७५) । १२९ ।
(१) १६७५, (२) १७९६, (३) १९२९, (४) १९२९, (५) १७९६ तथा (६) १६७५
गदिता उदयप्राणा मेषु तौल्यादि षट्कयो
उदयेऽस्त मये मध्ये समाः स्युः व्यक्ष देश के । १३० ।
क्रम से मेष आदि ६ राशि या तुला आदि ६ राशि के उदय असु (प्राण )
हैं । उदय (पूर्वाक्षितिज), अस्त (पश्चिम क्षितिज) , दशम (माध्यन्दिनरेखा पर ऊपर
की तरफ,) चतुर्थ (नीचे की तरफ ) पार करने भी राशियों को यही समय लगता
है ।
स्वदेश लग्न ज्ञानार्थं मघोध्धेः परिशोधनम्
चरासूनां तथा कार्यं ततः स्वचर खण्ड काः । १३१ ।
अपने स्थान पर राशियों का उदय असु निकालने के लिये पूर्वसूत्र के अनुसार
उस स्थान के लिये प्रथम तीन राशियों के चर खण्ड निकालते हैं ।
अजादि त्रितयेत्याज्याः कर्यादि त्रितयेऽन्विताः ।
तुलादि त्रय एवाढ्या नक्रा द्वित्रय उज्झिताः । १३२ ।
इन चर खण्डों को क्रम से लंका से प्रथम और अन्तिम तीन राशियों के
उदयासुओं से घटाते हैं तथा द्वितीय और तृतीय तीन राशियों के उदयासुओं से
घटाते हैं ।
राशीनामुदया एवं स्वचरैः संस्कृताः क्रमात् ।
स्वदेश जाःस्यु सर्वत्र मध्यलग्नाः निरक्षजाः । १३३ ।