सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह स्फुटी करणम् ७५
शून्यांगाग्नि (३६०) कलायु तार्क वियुताः स्पष्टेन्दु लिप्ताहृताः । २०४ ।
स्फुट चन्द्र और स्फुट रवि को जोड़कर यदि वह १२ राशि से अधिक हो तो
उससे १२ राशि घटाकर उसकी कला आदि में योग की भोग्य कला (८००) से
भाग देते हैं । लब्धि विष्कम्भ आदि गतयोग संख्या होगी । लब्धि में १ जोड़ने
से वर्तमान संख्या होगी । शेष गतकला तथा भाजक में (८००) में शेष घटाने से
पर गम्य कला होगी । गत या गम्य कला में ६० से गुणा कर रवि और चन्द्र गति
के योग से भाग देने पर वर्तमान योग के गत और गम्य दण्डादि आयेंगे ।
स्पष्ट रवि की कला में ३६० कला जोड़कर स्फुट चन्द्र की कला से घटायें ।
भुक्तैव करणस्य (३६०) तानि तिथिवत् तन्नाड़िका द्याम्रताः
समानां ववतः शितः प्रतिपदः प्रान्तार्द्धतः संस्थितः ।
तिथ्यर्द्धेष्वपि कृष्ण भूतदलतः प्रान्तात्सिता देर्दलम्
यावत् शाकुनकं चतुष्पदमथो नागञ्चकिंस्तुघ्नकम् । २०५ ।
शेष में एक करण की भोग्य कला (३६०) से भाग दें । लब्धि को ७ से भाग
देने पर शेष गत करण संख्या और शेष में १ जोड़ने पर वर्तमान करण संख्या
होगी । करण का आरम्भ शुक्ल प्रतिपदा उत्तरार्द्ध में वव आदि से प्रारम्भ होता है
तथा कुल ७ करण बीतने पर पुनः प्रथम आरम्भ होता है । चान्द्रमास के ३० तिथि
में ६० करण होते हैं । जिसमें ७ करणों का ८ बार चक्र कृष्ण चतुर्दशी के प्रथमार्द्ध
में पूर्ण होता है । (५६ करण) शेष ४ करण कृष्ण चतुर्दशी शेषार्द्ध से शुक्ल प्रतिपदा
प्रथमार्द्ध तक स्थिर करण हैं जिनके नाम हैं- शकुनि, नाग, चतुष्पद तथा किंस्तुभ ।
नाड़ी हराद्यदधिकागत गम्यलिप्ता स्तद्
वृद्धि मृच्छति तिथि प्रमुखांगजातम् ।
भोगानिजा विकलिताः स्वघटी हराप्ताः
तत्तत्प्रमाण घटिकादि फलंक्षयादौ । २०६ ।
सूर्योदय के समय वर्तमान तिथि की कुल (गत और गम्य कला = ७२०)
यदि चन्द्र और रवि को दैनिक गति के अन्तर से अधिक हो (गति अन्तर ७२०
कला से कम हो) । तो तिथि वृद्धि होती है (अर्थात् ६० दण्ड से अधिक होगी)
तिथि भोग्य विकला (७२० x ६०) में चन्द्र रवि गति अन्तर (हार) से भाग देने पर
तिथि को भोग्य फल घटिकादि में आता है । यह ६० से अधिक पर तिथि वृद्धि,
कम होने पर तिथि क्षय होता है ।
मासोऽसंक्रम एन्दवस्तु मलिनः सोऽन्तर्भवेदुत्तरे
संक्रान्ति द्वययुक् क्षयो यदि कदातत् पार्श्वयोर्द्वौ मलौ ।
स्यातां मास चतुष्टयान्तर न योः संसर्पता मादिमः ।
क्षोणोऽहंस्पतिरन्तितो मल इमे त्याज्या विवाहादिषु । २०७ ।
चान्द्र मास (एक अमान्त से अगले अमान्त तक) में रवि संक्रान्ति (रवि एक
से दूसरी में जाने से) से शुद्ध चान्द्र मास होता है । रवि संक्रान्ति नहीं होने पर