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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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७४ सिद्धान्त दर्पण
से अधिक होने पर १५ का अन्तर करेंगे। बाकी संख्या कृष्ण पक्ष के बीते दिनों
की संख्या होगी। उसमें १ मिलाने पर वर्तमान तिथि संख्या होगी।
तच्छेषा गतगम्य का विकलिता श्चन्द्रार्क गत्यन्तरे
णाप्ताः स्यु क्रमश्रो गतैष्य घटिकाः साकं स्वषष्ट्यंशकैः
तिथ्यन्तान्तिक काल चालित विधोस्त त्काल भुक्त्या पुनः
साध्याः संशयितेष्ट कर्मसमयेऽन्यत्रद्वय हेन्द्रन्तरा । २०२ ।
वर्तमान तिथि के बारे में दण्ड (गत काल) तथा बाकी (गम्य) दण्ड निकालने
के लिए, तिथि निकालने में चन्द्र रवि कलादि अंतर को ७२० से भाग दे अवशेष
का विकला बनायेंगे (६० से गुणा कर)। इससे गत काल निकलेगा। गम्यकाल
निकालने के लिए ७२० से अवशेष घटाकर उसे विकला बनायेंगे। वर्तमान दिन
और आगामी दिन के स्पष्ट रवि और स्पष्ट चन्द्र से उनकी आज की दैनिक गति
निकालेंगे, चन्द्र गति तथा रवि गति (दैनिक) के अन्तर से शेष, विकला (या
७२० से अन्तर) में भाग देंगे। फल गत या गम्य तिथि का दण्ड आदि में मान
होगा। यह पूर्णठीक नहीं होने पर भी प्रायः ठीक है (एक तिथि की गति के
बदले सावन दिन की गति का प्रयोग किया गया है। धर्म आदि कार्यों के लिये
परिसूक्ष्म तिथि निकालना हो तो प्रतिदिन अन्तर में रवि और चन्द्र और स्फुट कर
उनकी एक तिथि की गति को अन्तर से तिथि स्पष्ट किया जायेगा।
स्पष्टेन्दोः कलिका भभोग (८००) विहृता लब्धश्च दस्त्रादयः
स्तारः सुर्विगता गतैष्य कलिकाः षष्ट्याहता भाजिताः ।
गत्याचन्द्रमसः फलानि घटिकास्तद् वद् विधो लिप्तिका-
स्तद् भोगाप्त (१८००) गत क्रियादि निलया नाड्योऽन्य भुक्त्या तथा । २०३ ।
स्फुट चन्द्र की कला आदि को नक्षत्र कला (८००) से भाग देने पर लब्ध
अश्विनी आदि नक्षत्र संख्या आयेगी। गत नक्षत्र संख्या लब्धि में १ जोड़ने पर
वर्तमान नक्षत्र संख्या आयेगी । अवशेष नक्षत्र का गत अंश और उसे ८००
(भाजक) से घटाने पर गम्य आयेगी। उसने ६० से गुणा कर विकला बनायेंगे
तथा चन्द्र दैनिक गति से भाग देने तो तिथि का गत और गम्य दण्ड आदि
आयेगां । स्फुट चन्द्र की कला आदि को राशि की भोग कला १८०० से भाग देने
पर लब्धि पूर्ण राशि संख्या आयेगी। लब्धि में १ जोड़ने पर वर्तमान राशि संख्या
होगी (मेष आदि)। शेष वर्तमान राशि का गत अंश तथा १८०० से उसे घटाने
पर भोग्य अंश होगा। गत या भोग्य अंश को ६० से गुणा कर विकला बनायेंगे।
और उसे स्पष्ट चन्द्र की दैनिक गति से भाग देंगे तो वर्तमान राशि का गत दण्ड
या गम्य दण्ड आदि आयेगा।
स्पष्टेन्द्वर्क युतिस्तु चक्र वियुक्ता चक्रा (२१,६००) धिकाचेद्धता
भुक्त्या योग जया (८००) फलानित इतः शेषागतैष्याः कलाः ।
षष्टि घ्ना रवि चन्द्र भक्तियुति हल्लब्धाश्च नाड् यादयः