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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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७२ सिद्धान्त दर्पण
इती रितै रस्त मयोद यांशैः सिद्धाः स्वकालाः खलुलेखनीयः
दृक् कर्म सिद्धास्त मयोदयानां सुदुष्करत्वात् व्यवहारि पञ्जयाम् । १९४ ।
व्यावहारिक पञ्जिका में यह उदय और अस्त अंश सन्धि समय लिखना
होगा । क्योंकि दृक्कर्म आदि कर यह समय मालूम करना बहुत कठिन है ।
यथात्रलिखितानि खण्डजफलान्तराणि क्रमात्
तथा गति फलान्तरं श्रुतिकलान्तरं साध्यताम् ।
चल श्रुति गति स्फुटी करण मात्मखण्डान्तरै
पुरोदित फलोद्द्यानयनवद् विधेयं बुधैः । १९५ ।
जिस प्रकार खण्डफल, खण्ड फलान्तर आदि परिशिष्ट में लिखा हुआ है
उसी प्रकार गतिफल का अन्तर और कर्णकला का अन्तर निकालकर भी लिखना
होगा । शीघ्र कर्ण, गति, स्फुटीकरण आदि अभीष्ट स्थान से पहले दिये गये फलों
से निकलेगा । यह बात आसानी से समझी जा सकती है ।
कार्यः सूर्य निशेषयो प्रतिदिनं विस्पष्ट भावः पुनः
पक्षे पक्ष दले बुधस्य विहितोऽन्येषान्तु पक्षान्ततः ।
मध्ये मध्य इह व्रजेद् यदि खगः सद् मर्ष वक्रार्जवा
न्यस्तञ्चाप्युदयं तदिष्ट दिनजः कार्योऽसकृद् भुक्तिभिः । १९६ ।
सूर्य और चन्द्रमा की स्फुटता प्रतिदिन सूर्योदय के समय करनी चाहिये ।
पक्षान्त (अर्थात् अमा और पूर्णान्त में) सभी ग्रहों की स्फुटता करनी होगी । बुध
को पक्षान्त और पक्षार्द्ध में भी स्फुट करना चाहिये । ग्रह वक्र, वक्र से मार्गी होने
अथवा राश्यन्तर नक्षत्रान्तर या वक्र सरल गति होते समय या उदय और अस्त
होने के समय उसके असकृत् (स्थूल) भाव से स्पष्ट करना चाहिये ।
सञ्चार ध्रुवलिप्तिका भपदका (२००) भाना (८००) गृहाणा (१८००) ञ्च या
स्तत्खेटान्तर लिप्ति का गति कला भक्ता दिनाद्यं फलं
खेटे तद्‌ध्रुवतः पुरः परगते कालादृत्य स्वं क्रियात्
काले चक्र गतौ धनर्ण मितितत्सञ्चार कालो भवेत् । १९७ ।
एक नक्षत्र पाद में २०० कला या लिप्ता, नक्षत्र में (८००) तथा राशि में (१८००)
लिप्ता में होती है । कोई ग्रह किसी नक्षत्र, उसके पाद या राशि में कब जायेगा
या कितने दिन से हैं । यह जानने के लिये उस ग्रह की राशि तथा ईष्ट राशि,
नक्षत्र या पाद का अन्तर कर उसे ग्रह की स्फुट गति कला से भाग देने से दिन
आदि फल आयेगा । यदि नक्षत्र आदि से ग्रह पूर्व में है तो उतने दिन में ग्रह
उसमें जायेगा, यदि ग्रह बाद में है तो इतने दिनों से उस नक्षत्र आदि में है । ग्रह
वक्र होने पर दिन आदि जोड़ने घटाने की उल्टी क्रिया होगी ।
पक्षान्तद्वय खेचरान्तर कलान्तर स्वद् घस्रसंख्या हृता-
स्तत्तद् भुक्ति कला फलं गति युग स्वल्पान्तरत्वे पुनः ।