सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह स्फुटी करणम् ७१
परिशिष्ट की खण्ड फल सारिणी में यदि किसी स्थान का खण्ड फल मिट
गया है या अस्पष्ट है, तो उस खण्ड संख्या को २२५ से गुणा कर कलात्मक केन्द्र
निकालते हैं । इस केन्द्र का भुज और उसकी भुजज्या निकाल उस स्थान पर
रखते हैं ।
स्फुटार्यमस्वान्तर भाग केषुशुक्रेज्य
चन्द्रज्ञय मारकाणाम् ।
अस्तं नवा (९) शा (१०) शिव (११)
सूर्य (१२) शक्र (१४) भूपेषु (१६) वक्रस्य भृगोर्नगेषु (७) । १८७ ।
सूर्य से निकटता के कारण ग्रहों का उदय और अस्त यहां दिया जाता है ।
शुक्र का (९) वृहस्पति का (१०) चंद्र का (११) बुध का (१२) शनि का (१४)
मंगल का (१६) वक्री शुक्र का (७) अंश ।
एतैऽशकाः खाभ्रगजेन्दु (१८००) निघ्नाः प्राक् साय्नार्कोदय मानभक्ताः
पश्चात्सषड् भायन संस्कृताक लग्न प्रमाण सुहृताः स्फुटाःस्युः । १९० ।
इन अंशों को १८०० से गुणा कर सायन अर्कोदय परिणाम से घटायेंगे । तो
क्षेत्रांश होगा (पश्चिम में यह क्षेत्रांश निकालने के लिए उसमें ६ राशि जोड़ेगे ।
फिर उस सायन रवि में ६ राशि जोड़कर उसका उदयांश निकाल उससे पश्चिम
का क्षेत्रांश घटायेंगे ।
एतै रवेः प्रागुदयं परास्तं न्यूनाधिकांयान्त कुजेज्य मन्दाः ।
व क्रौज्ञ शुक्रावथ ताव वक्रौपूर्वास्त पश्चादुदयौ विधुश्च । १९१ ।
मंगल, वृहस्पति और शनि के कालांश रवि से कम रहने पर सूर्योदय से
पहले वे पूर्व दिशा में उदय होते हैं । कालांश अधिक होने पर ये पश्चिम में अस्त
होते हैं । वक्री बुध और शुक्र रवि से यह कालांश कम होने पर पूर्व में अस्त
और पूर्व रवि से कालांश अधिक होने पर पश्चिम में उदय होता है ।
पूर्वोक्त केन्द्रांश दिने प्रहार्कान्तरैस्तदंशान्तर लिप्ति का द्याः ।
गत्यान्तराप्ताश्च फलं दिवादि स्वर्णं भवेदवक्रिणिभुक्ति युत्य । १९१ ।
पूर्वोक्त कालांशो से ग्रह किसी दिन कितने दिनों से अस्त या उदय हुआ है
और कितने दिन तक उदय या अस्त होगा यह जानने के लिए ग्रह और रवि का
अन्तर निकाल कर उसे उन दोनों के गति अन्तर से भाग देंगे ले अन्तर दिन
आयेगा । ग्रह वक्री होने पर दोनों के गति के योग से भाग दिया जायेगा ।
ग्रहार्क गत्योस्तनुभूरि भावं ज्ञात्वा ततो भावि गतौ च कालौ ।
वक्तव्य तत् खेटयुति प्रकाशादुक्तांश तुल्यत्वम वैतुमिष्टम् । १९३ ।
अन्तर दिन को इष्ट दिन से घटाने या जोड़ने पर कितने दिनों से उदय अस्त
हो रहा है या होगा यह मालूम होगा । ग्रह और रवि गति में कौन कम या ज्यादा
है इसका विचार करने से आगामी या गत समय का निर्णय होगा ।