सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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रहने पर) फल तृतीय गति होगी । तृतीय गति को शीघ्रोच्च गति से घटाने पर
चतुर्थ शीघ्र केन्द्र गति होगी ।
सातूर्य खण्डान्तर संगुणेषु पक्षाक्षि (२२५) हृल्लब्ध युतोनिता चेत्
स्फुटा फलार्द्धिष ययोः स्व खण्डमध्ये श्चियं स्यादनृजुः पुरेव । १८३ ।
४र्थ शीघ्र केन्द्र के ३ य (तृतीय) ग्रह के शीघ्र खण्ड फलान्तर से गुणा कर
२२५ से भाग देने कर फल को ३ य गति में जोड़े या घटायें (कर्कादि या मकरादि
६ राशियों) में तो स्पष्ट दैनिक ग्रह गति प्राप्त होगी । फल ऋणात्मक होने से ग्रह
गति को वक्री कहा जायेगा ।
कुजज्ञ सौरि प्रथम द्वितीय गत्यो धनर्णं क्रमशो विधायः
वक्रर्जु मन्दोच्च गतिं द्वितीय तृतीय भुक्तिः तत एव साध्ये । १८४ ।
मंगल, बुध और शनि के प्रथम, तृतीय प्रकार की गति में वक्र मन्दोच्च गति
को जोड़ा जाता है और मार्गी मन्दोच्च गति को घटा कर केन्द्र गति निकाली जाती
है । इससे मन्दगति फल निकाल कर द्वितीय और तृतीय गति का साधन होता
है ।
मन्दजुं भुक्तेः प्रथमाल्प काचेत् विलोम शुद्धे रवशेषतः स्यात् ।
द्वितीय भुक्तेश्च तथा तृतीय भुक्तेः फलं किन्तु धनर्णवामम् । १८५ ।
मार्गी मन्दोच्च गति से प्रथम गति कम करने प्रथम गति मन्दोच्च से घटायी
जायेगी । शेष से द्वितीय गति साधन तथा इसी प्रकार तृतीय रातिफल साधन
होगा । गतिफल का संस्कार विपरीत तरीके से अर्थात् तुलादिकेन्द्र में घटाते हैं ।
एवं विधे सम्भवत स्त्रयाणां द्वितीयतात्तिर्यगतो परोञ्चात् ।
वक्रादिमा मन्द विदोस्त नोश्चेद् वक्रोञ्चभुक्तेः पतितावशेषात् । १८६ ।
इस प्रकार मंगल, बुध और शनि इन तीन ग्रहों की द्वितीय और तृतीय गति
निकाली जाती है ।
साध्या द्वितीया थ ततोऽधिकाचेत्तयोज्झितां मान्द्यमतो विलोमम् ।
वक्रादिभुक्ता वृजु मन्द भुक्ति योज्या ततो मान्य फलञ्च वाम्यात् । १८७ ।
बुध और शनि की प्रथम वक्र गति मन्दोच्च गति से कम होने पर इस आद्य
गति को वक्र मन्दोच्च गति से घटाकर द्वितीय गति निकाली जाती है । वक्र प्रथम
गति वक्र मन्दोच्च गति से अधिक होने पर वक्रमन्दोच्च गति घटाते हैं । शेष मन्द
गतिफल को पूर्व नियम के अनुसार विपरीत क्रम से जोड़े या घटायेंगे । (वक्र
प्रथम गति में मार्गी मन्दोच्च जोड़कर उससे विपरीत क्रम से जोड़घटाकर
मन्दगतिफलं का साधन होगा) ।
क्वचित्फलं नष्ट मविस्फुटं चेत्तत्खण्ड संख्यार्थ भुजाक्षि (२२५) निघ्नी
कलात्मकं केन्द्र मतः फलाद्यं दोर्ज्या दिनातीय विलेखनीयम् । १८८ ।