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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 609 में से

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ग्रह स्फुटी करणम् ६९
घटाया जायेगा । इस प्रकार शीघ्रार्द्ध, मन्दार्द्ध, समग्र मन्द समग्र शीघ्र फल द्वारा
संस्कृत होने पर मध्यम ग्रह स्फुट होगा ।
सूर्येन्दु भौम परिधिक्षय वृद्धि भेदान्मान्द्यं
फलं चल फल प्रतिमं विलेख्यम् ।
खण्डैर्गजाब्धि (४८) भिरिदं निज वर्द्धमान
क्षीणत्वतः स्फुटमपि हनवक्रितास्मात् । १७८ ।
रवि, चन्द्र और मंगल की मन्द परिधि वृत्त पाद में पृथक् पृथक् होने से शीघ्र
फल की तरह मन्द फल भी ४८ खण्डों में लिखा गया है । गत और एष्य दोनों
खण्डों के बीच का फल लाने के लिए पिछले श्लोक की विधि अनुसार कार्य
करेंगे । खण्ड बढ़ते समय वह पिछले खण्ड फल में जोड़ा जायेगा । कम होते
समय अन्तर होगा । मन्दफल में वक्रगति नहीं होती ।
भौमस्य यन्मृदुफलं परिधिक्रमोत्थं द्वाविंशत
(२२) स्तदिसप्तसुखण्डकेषु
साध्यं न किन्तु भवन त्रयजं (११।२।४७)
विलेख्यं तत्तक्षयवृद्धिविषमत्वनिवृत्ति हेतोः । १७९ ।
मंगल का मन्दफल लाने के लिए २२ और २८ वें खण्ड के बीच गणित
करते की जरूरत नहीं है । इन खण्डों में २८ वां खण्डफल ११।२।४७ लेकर कार्य
करना है क्योंकि इनमें खण्डफलों का कोई परिवर्तन नहीं होता ।
द्राक् केन्द्र जा खण्ड फलान्तर घ्नी
भुक्ति र्हता तत्वयमैः (२२५) फलस्य
अर्द्धे न युक्तोनित मध्य
भुक्ति र्भवेत् फलाद्या फलवृद्धि हान्योः । १८० ।
शीघ्र केन्द्र गति को खण्ड फल से घटाकर २२५ से भाग दें । शीघ्र फल
वृद्धि पाते समय या हास होते समय इस फल के आधे को मध्यगति में जोड़े या
घटायें । यह प्रथम गति होगी ।
द्वितीय मन्दोत्थफ लान्तरघ्नी तत्त्वाश्वि (२२५) हल्ल ब्ध दलोन युक्ता
सा नक्र कर्कादिक मन्द केन्द्रे द्वितीय भुक्तिः पुन रेव मेषा । १८१ ।
प्रथम गति को मन्द खण्ड फलान्तर से गुणन कर (प्रथम ग्रह सम्बन्धी), २२५
से भाग दे । लब्धि के आधा को प्रथम गति में योग (मन्द केन्द्र कर्क आदि ६
राशि में) या वियोग (तुला आदि ६ राशि में) करें । फल द्वितीय गति होगी ।
फलान्तरघ्नीषु भुजाक्षि (२२५) भक्ता तल्लब्धहीनान्वित मध्य भुक्तिः
भवेत्तृतीया च तदुज्झिताशु भुक्ति र्भवेत् केन्द्रगतिस्तुरीया । १८५ ।
द्वितीय गति को २ य ग्रह के मन्दखण्ड फलान्तर से गुणा कर २२५ से भाग
देकर फल को द्वितीय गति में जोड़े या घटाये ( मन्द केन्द्र कर्कादि या तुलादि में