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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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६८ सिद्धान्त दर्पण
कला, विकला आदि है उनको खण्ड फलान्तर से गुणा कर उसे ६० से भाग
देंगे । फल को अंश आदि में मिलाकर उसे ३० से भाग देंगे ।
शिष्टाद् विनिघ्नाः फल युग्म तारूयं
मान्द्यफलं प्राग्वदिदं धनर्णम् ।
खण्डान्तरघ्नी मृदु केन्द्र भुक्ति स्तत्वाश्विव
(२२५) भक्ता फलमिष्ट भुक्तै । १७३ ।
शेष को २ से गुणाकर फल को गत मन्दफल खण्ड में जोड़े । यह पूर्वनियम
अनुसार योग या वियोग होगा । परिशिष्ट के खण्डफलों से इसी प्रकार ग्रह का
अभीष्ट मन्दफल होगा । मन्द केन्द्र गति को खण्ड फलान्तर से गुणाकर २२५ से
भाग देने से दो खण्डों के बीच का मन्द फल गतिफल है ।
स्यात् खण्ड मध्ये ऽथ पुरः परोच्च खण्डोऽत्थ लिप्ता फल मन्तरञ्च ।
लेरूयं गतिश्चस्फुट मेव मेतत् स्वर्णं कुजज्ञार्क मृदौङ्ग शीघ्रे । १७४ ।
परिशिष्ट में २४ खण्ड की सारणी में पहले मंगल, बुध और शनि का परोच्च
खण्ड फल लिखा गया है । खण्डफलान्तर और खण्डान्त उच्च गति भी लिखा
गया है । इस खण्ड फल से पूर्व नियम अनुसार परोच्च फल निकाल कर उसको
मंगल, बुध और शनि के मन्द केन्द्र में और बुध शीघ्रोच्च में जोड़ने या घटाने से
(पूर्व नियम अनुसार) परोच्च संस्कृत स्फुट गति होती है ।
शीघ्राद् ग्रहोनाद् गृहषट् कमाद्यं केन्द्रं गतं गम्यपथान्त्य षट्कम् ।
तद्राशि भागादिक मष्ट निघ्नं प्राग्वद्धृतं राशिमितास्तु खण्डाः । १७५ ।
शीघ्रखण्ड सारणी में भी १८० डिग्री को ४८ खण्डों में बांटा गया है जो तीन
राशि के २४ खण्डों में (३°४५') के बराबर है ।
शीघ्रोच्च से ग्रह (मन्द स्फुट) को घटाने से शीघ्र केन्द्र होता है । शीघ्र केन्द्र
मेषादि ६ राशियों में होने से गत तथा तुला आदि ६ राशि में होने से उसे घटाने
पर गम्य कहलाता है । केन्द्र के राशि भाग आदि को आठ से गुणा कर पूर्ववत्
६० से भाग देने पर खण्ड संख्या आती है ।
यातास्तदुत्थं फलं मंशकादेः खण्डान्तरघात् खगुणा (३०) प्रयुक्तम्
वर्द्धिष्य माणे फल एव कार्यं तत्सीय माणे पतितं गतारूयात् । १७६ ।
गत खण्डों के खण्ड फल (सारणी द्वारा) निकाल कर फल बढ़ने के समय
गत और गम्य खण्ड के अन्तर से अवशेष खण्ड को गुणा कर ३० से भाग देंगे
और लब्धि को जोड़ेंगे फल हास होने के समय अन्तर होगा । यह खण्ड फल
ही शीघ्र फल होगा ।
स्फुटफलं शैघ्य मिदं धनर्णं केन्द्रस्य पूर्वार्द्ध परार्द्धयोः स्यात् ।
शैघ्यार्द्ध मान्द्यार्द्ध समग्र मान्द्य शैघ्यै फलै प्राग्वदिहं क्रियास्युः । १७७ ।
प्रथम ६ राशि में शीघ्र केन्द्र होने से यह जोड़ा जायेगा द्वितीय ६ राशि में