सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रह स्फुटी करणम् ६७
सूर्य की स्थिति के कारण लोप होता है ।
स्फुट ग्रहो मन्द चलैः फलैर्व्यस्त धनर्णकैः ।
मुहुः सुसंस्कृत स्थैर्यं प्राप्तो मध्य ग्रहो भवेत् । १६६ ।
स्फुट ग्रह से मध्यम ग्रह लाने के लिए उसमें मन्द और शीघ्र फल को विपरीत
नियम से संस्कार करते हैं । फिर इस प्रकार मध्य ग्रह आने पर पूर्व क्रम से साधन
होगा । दोनों मध्य ग्रहों में कोई अन्तर नहीं रहने पर ही सही मध्यम ग्रह होगा ।
ग्रहस्फुटी करण परिश्रमत्रसन्मनुष्यहृत् प्रमदपदं वदन्ति यत् ।
विलिख्यते मृदुचलखण्डजं फलं मयामलं चपल विवोधदं हि तत् । १६७ ।
ग्रह स्फुट का साधन विधि बहुत कठिन और लम्बा होने के कारण उसमें
भूल होने की आशंका रहती है । अतः मैं सरल और जल्द स्फुट विधि के लिए
शुद्ध खण्डफलों को लिख रहा हूँ ।
शून्यादिसिद्धा (२४) खण्ड संख्याधोधो लिखे न्मान्द्य फलं लवाद्यम् ।
तदन्तरं सर्व खगस्य कोटे फलं कुजादेश्च गते रवीन्द्रोः । १६८ ।
परिशिष्ट में शून्य से आरम्भ कर २४ खण्ड तक मन्द और शीघ्र फलों की
तालिका है । इसमें सभी ग्रहों का कोटिफल, मंगल आदि ग्रहों का गतिफल,
रविचन्द्र का गतिफल ।
खाद्यष्ट वेदा (४८) वधि खण्ड संख्या तले तथा शैघ्य फलं लवाद्यम् ।
खण्डान्तजं खण्ड फलान्तरोत्थ लिप्तादय स्तञ्चल कर्ण लिप्ताः । १६९ ।
४८ खण्ड का शीघ्र फल, खण्ड फलान्तर, शीघ्र कर्ण लिप्ता
पश्चात् फलाद्यस्य विलेखनीया च क्रप्रवेशापगम स्वभागाः ।
द्राक् केन्द्राजाश्वास्त मयोद यांशा कुजंज्ञ देवेज्य सितासिता नाम् । १७० ।
चक्र प्रवेश और क्रान्ति के अंश आदि, उदय और अस्त काल का शीघ्र
केन्द्रांश (मंगल, बुध, गुरु, शुक्र शनि के लिए) दिये गये हैं ।
ग्रहान्मन्दोञ्च भुजालयांश लिप्ताविलिप्ताः पृथगष्टनिघ्नाः ।
अन्ताद्धृताः खर्तुभि (६०) रभ्रषड्भि (६०) र्वियद् गुणै (३०)
स्तत्फलसंयुताश्च । १७१ ।
मन्द केन्द्र भुजांश कला विकलाआदि को अलग अलग ८, से गुणा कर
विकला आदि को ६०, ६० से भाग देकर अंश में जोड़ अंश पर्यन्त आने पर उसमें
३० से भाग देकर-
तद्रांशि संख्यात्थफलं गताख्यं भागादयः खण्ड फलान्तरघ्नाः ।
अन्त्याखषड् (६०) भक्त फलस्य मूल भागाः खरामै (३०)
र्विहता फलंतत् । १७२ ।
राशि होगी । राशि तुल्य फल गंत फल होगा । इसके अतिरिक्त जो अंश,