सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ सिद्धान्ते दर्पण
मंगल का १६३) अंश , बुध का (१४६ अंश) गुरु का (१२६ अंश) शुक्र का
(१६७ अंश) चतुर्थशीघ्र केन्द्रांश रहने पर-
सूर्य सिद्धान्ते-भवन्ति वक्रिणस्तैः स्वैः स्वैश्चक्राद्विशोधितैः
अवशिष्टांग तुल्यान्त्य केन्द्रैरुज्भ्यन्ति वक्रिताम् । इति । १६० ।
(सूर्य सिद्धान्त के मत से) वक्री होते हैं । ३६० अंश में इस चतुर्थ शीघ्र
केन्द्रांश को घटाने पर जो बाकी अंश होता है, उतने अंश पर ग्रह पुनः मार्गी
होंगे) ।
व्यवहारे च दृक् सिद्धा वुदयास्त मयो द्विधा
खे चराणां स्थूल सूक्ष्मो कथ्यते प्रथमाविह । १६१ ।
ग्रहों का उदय और अस्त अंश दो प्रकार का है-व्यावहारिक को स्थूल तथा
दृक् सिद्ध को सूक्ष्म कहते हैं ।
प्रतीच्या मन्त्य केन्द्रांशै रस्तं यान्ति कुजादयः
दृक् सुरै (३३२) गोऽर्थ शशि भी (१५९)
रस