सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह स्फुटी करणम् ६५
ततो द्वित्रिगतीसाध्ये प्राग्वत् कोटिफलाहतेः ।
ज्ञस्यतुस्पष्ट शीघ्रोच्च भुक्तेर्मध्य तृतीयके। १५२ ।
इन संस्कृत प्रथम और द्वितीय गति से पूर्व नियम के अनुसार मन्द कोटिफल
से गुणा कर द्वितीय और तृतीय गति का साधन होगा । नयी द्वितीय और तृतीय
गति को स्फुट शीघ्रोच्च गति से घटाने पर प्रथम और चतुर्थ गति का साधन होगा ।
बुध के चतुर्थ गतिफल को दो स्थानों रखकर-
प्रोज्भ्यादि तुर्ये कर्त्तव्ये तत्र तुर्य गतेः फलम् ।
पृथक् संस्थाप्य तदधो मन्द कोटिफलाहतम् । १५३ ।
एक स्थान पर उसे मन्द कोटि फल से गुणा कर
त्रिज्याप्तं मन्द केन्द्रेऽस्य कर्क या दौ मकरादिके ।
धनमृणं मुध्र्वं क्रमशः कृत्वा तद् विस्फुटं भवेत् । १५४ ।
त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर लब्धि को चतुर्थ फल में योग (मन्द केन्द्र
कर्क आदि) ६ राशि में रहने पर ) या वियोग (मकरादि राशियों में रहने पर)
करेंगे । इस प्रकार बुध का विशेष स्फुट गतिफल होगा ।
शीघ्रार्द्ध भुक्तौ वक्रायां यदि मान्द्यार्द्धजं फलम् ।
ऋणं तदातयोर्योंगे धनं चेद् वियुते द्वयोः । १५५ ।
शीघ्रार्द्ध गति वक्र होने पर यदि मन्दार्द्ध गति फल ऋण है तो उनको जोड़ेंगे ।
यदि मन्दार्द्ध गति फल धन को हो तो दोनों का अन्तर होगा ।
शेषो द्वितीय भुक्तिः स्याद् वक्रैवा सास्तु संस्कृतेः ।
यत्स्यानमन्द फलं कर्कि न क्रादोः स्वर्ण मेवतत् । १५६ ।
फल वक्र गति है जिसे द्वितीय गति कहते हैं । इसके बाद जो मन्द गति
फल आता है । उसे कर्क आदि ६ राशियों में रहने पर जोड़ते हैं तथा मकरादि
६ राशियों में रहने पर घटाते हैं ।
स्फुरन्ति गत्यानयने बहुधा कल्पना अपि
क्लिष्ट भावादिह व्यक्ता ग्रहसंचार युद्धयोः । १५७ ।
मध्यग्रह को स्फुट करने के लिए अनेक उपाय मेरे मन में आ रहे हैं पर वह
अत्यन्त क्लिष्ट होने के कारण यहां नहीं दिया जा रहा है ।
वर्त्तमानेष दिनज स्फुट ग्रह कलान्तरम्
गृह्यतां भुक्ति रित्यर्क चन्द्रयोस्तु विशेषतः । १५८ ।
ग्रह एकराशि से अन्य राशि तथा ग्रह युद्ध होने के समय ग्रह की दैनिक
स्पष्ट गति से काम होता है । सिर्फ रवि और चन्द्र के लिये अलग विधि है ।
गुणर्तुचन्द्रे (१६३) स्तर्केन्द्रे (१४६) रस सूर्ये (१२६) नगाष्टिभिः । (१६७)
शररुद्रे (११५) श्रुत्यर्थांशु केन्द्रांशे भूसुतादय । १५९ ।