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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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ग्रह स्फुटी करणम् ६३

कर्मादि मिष्यतेऽन्यत्र व्यवहारेषु नैवतत् ।
तेषु ग्राह्यं स्फुटाकैन्द्राः पूर्वापर विनान्तरम् । १३८ ।
अन्य सामान्य व्यवहार के काम के लिए इतना स्पष्ट की आवश्यकता नहीं
है । उसके लिए स्फुट रवि तथा चन्द्र की दैनिक गति द्वारा ही सभी कर्म होंगे ।
यह औदयिक दैनिक गति होगी ।
शीघ्रोच्च भुक्ति र्मध्यो ना शीघ्र केन्द्र गतिर्मता
फलांशान् खांक (९०) भागेभ्यः शैघ्रान् संशोध्य शेषतः । १३९ ।
शीघ्रोच्च गति से ग्रह गति का अन्तर करने पर शीघ्र केन्द्र की गति होती हैं ।
शीघ्र फल को ९० डिग्री से घटाकर शेष फल से-
क्रमेज्या पिण्ड मानीय तेन द्राक् केन्द्र जा गतिम् ।
गुणितां चलकर्णाप्तां शीघ्रभुक्ते र्विशोधयेत् । १४० ।
शीघ्रफलकोटिज्‍या निकलेगी, उसे शीघ्र केन्द्र की दैनिक गति से गुणा कर
चल कर्ण (शीघ्र कर्ण) से भाग दें । तथा फल को शीघ्रोच्च गति से घटायें ।
शीघ्र स्फुट गतिः शेषो यदि शुद्धि विलोमतः
सम्भवेदवशिष्टा तद् गति र्वक्रेति कथ्यते । १४१ ।
फल शीघ्र स्फुट गति होगी । यदि उक्त फल शीघ्रोच्च गति से अधिक हो तो
शीघ्रोच्च गति से फल को घटायेंगे । शेष वक्रगति होगी ।
एवं मन्दस्फुटा शीघ्र स्फुटा भुक्तिर्द्विधोदिता
स्फुट भुक्ति रथोतारा खेचराणां विविच्यते । १४२ ।
इस प्रकार रवि और चन्द्र को छोड़ अन्य ५ तारा ग्रहों की दो प्रकार की गति
है-मन्द स्फुट और शीघ्र स्फुट । रवि और चन्द्र की केवल मन्दस्फुट गति है ।
अब मंगल आदि तारा ग्रहों की स्फुट गति का विचार किया जाता है ।
शीघ्र स्फुट गतिर्मध्या धिका चेन्मध्य शोधिता
मध्योनाशोधिता मध्य भुक्ति र्यत्स्यात् तदन्तरम् । १४३ ।
शीघ्र स्फुट गति दैनिक मध्य गति से अधिक होने पर, शीघ्र स्फुट गति से
दैनिक मध्यम गति घटाते हैं । दैनिक मध्य गति अधिक हो तो उससे शीघ्र स्फुट
गति घटाते हैं ।
वक्रामध्यन्विता चापि शैघ्रमध्यान्तरराभिधम् ।
तत्स्यादाद्यं गतिफलं तद र्ध्वे नैव मध्यमा । १४४ ।
शीघ्र स्फुट गति वक्र होने पर उसे दैनिक मध्यम गति में जोड़ते हैं । इन
तीनों (अन्तर या योग) का नाम आद्यगति फल है जिसका आधा करते हैं ।
शीघ्र स्फुट गते र्मध्या धिकोनत्वे युतोनिता
वक्रत्वेऽप्युनिता तेन ऋज्वी स्यात् प्रथमागतिः । १४५ ।