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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 609 में से

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पृष्ठ 159

६२ सिद्धान्त दर्पण
लब्ध मुध्र्वे धनमृणं क्रमात्ककिं मृगादिगे ।
मन्द केन्द्र स्फुटं तस्यादथ भुक्तिर्विवच्यते । १३१ ।
• इस लब्धि को तृतीय मन्द केन्द्र में जोड़े या घटायें (मन्द केन्द्र कर्क आदि
६ राशि में रहने पर जोड़े अन्यथा घटायें) बुध के शीघ्र फल से संस्कृत तृतीय
मन्द बुध से अतिस्फुट होता है । (सूर्य सिद्धान्त के स्फुट की तुलना में अधिक
शुद्ध होता है ।)
पूर्वा पर दिन स्पष्ट ग्रहान्तर कलागतिः
स्फुटेति सम्मता किञ्चित् भेदगापि प्रतिक्षणम् । १३२ ।
अब ग्रहों की गति का विचार किया जाता है । यह गति प्रतिक्षण बदलती
है लेकिन दो क्रमागत दिनों के दो स्फुट ग्रहों के अन्तर को उस दिन की स्फुट
गति (उस दिन के लिए मध्यम गति) होती है ।
मन्दोच्च भुक्ति रहिता मध्य भुक्तिग्रहस्यया
मन्द केन्द्र गतिः सेयं मन्द कोटिफल ज्या । १३३ ।
मन्दोच्च की दैनिक गति को ग्रह की मध्यम गति से घटाने से मन्द केन्द्र की
दैनिक गति होती है । मन्द केन्द्र की दैनिक गति को मन्द कोटिफल ज्या से -
गुणिता त्रिज्यया (३४३८) भक्तामन्दस्फुटी फलंभवेत् ।
कर्क्यादि केन्द्र के तेनाष्य मकरादौ च वर्जिता । १३४ ।
गुणनकर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर दैनिक मन्द गति फल होता है ।
मन्द केन्द्र कर्क आदि ६ राशियों में रहने पर इसे ग्रह की मध्यम गति में जोड़ेंगे,
मकरादि ६ राशियों में रखने पर घटायेंगे ।
ग्रहस्य मध्यमा भुक्ति र्मन्द स्फुट गतिर्भवेत्
प्रातः सा संस्कृतादीनाता तदहोरात्र इष्यते । १३५ ।
प्राप्त फल ग्रह की मन्दस्फुट गति होता है । सूर्य उदय से अगले दिन सूर्योदय
तक (अहोरात्र) में यह ग्रह की मन्दस्फुट गति होगी ।
प्रात र्कोन शुभ्रांशो स्तिथ्यन्तो यः प्रसाध्यते ।
पुनस्तत्काल चन्द्रस्य गत्या तत्काल जातया । १३६ ।
सूर्योदय के समय स्पष्ट सूर्य और चन्द्र का अन्तर कर तिथि का जो शेषकाल
निकलता है उससे तिथ्यन्त काल में चन्द्र की स्पष्ट गति निकाल उससे तिथ्यन्त
का पुनः संस्कार करते हैं ।
संस्कार्य स्तत्र शुद्धयर्थं गतगम्य फलादयः
श्राद्धादि समय व्याप्ति सन्देह ग्रहणेस्तथा । १३७ ।
इस प्रकार तिथि के आदि और अन्त का संस्कार बहुत शुद्धि के लिए होता
है । इसकी आवश्यकता तब है जब श्राद्ध या ग्रहण के समय में सन्देह हो ।