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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

ग्रह स्फुटी करणम् ६१
गुणनकर उसमें १० से गुणा कर उसको अन्तिम कर्ण से घटाने में पर लिप्तादि में
फल आता है ।
मन्द केन्द्रे ऽज तौल्यादौ सम्भवेत् पञ्चम-स्फुटः ।
पुनस्तृतीय केन्द्रेऽस्य कक्यादिस्थे तुरीयकम् । १२५ ।
पंचम स्फुट के लिये इस लिप्तादि फल को मन्द केन्द्र मेष आदि ६ राशियों
में रहने पर चतुर्थ (स्फुट) ग्रह में जोड़ेगे, अन्य राशियों में मन्द केन्द्र रहने पर
घटायेंगे । मंगल का तृतीय मन्द केन्द्र कर्क आदि राशियों में रहने पर -
फलं पञ्चेषु (५५) भक्ताप्तं मन्द कोटिज्यया हतम् ।
तूर्यकर्णहतं लब्धं तुरीय फल वक्तृजे । १२६ ।
चतुर्थ फल को ५५ से घटाकर फल को मन्द कोटिज्या (तीसरे संस्कार की)
से गुणा कर चतुर्थ कर्ण से घटाते हैं ।
पञ्चमे संस्कृतं चेत्स्यात् षष्ठः स्पष्ट तमस्तदा
भवेत् समन्द केन्द्रेतु नक्रादावेव पञ्चमः । १२७ ।
कलादि फल को पंचम ग्रह में संस्कार करने पर षष्ठ स्फुट ग्रह होता है ।
तीसरे संस्कृत ग्रह का मन्द केन्द्र मकर आदि ६ राशि में रहने पर षष्ठ संस्कार
अनावश्यक है । ५ म ग्रह स्पष्ट ग्रह होगा )
परोङ्ग संस्कृताज् ज्ञस्य शीघ्रन्मध्यस्य शोधनात्
प्राक् फलार्द्धं पृथङ् न्यस्य फले मान्द्यार्द्ध मान्द्यके । १२८ ।
परोङ्ग संस्कृत बुध के शीघ्रांङ्ग से मध्यम बुध को घटाने से जो शीघ्र केन्द्र
आता है, प्रथम शीघ्र फलार्द्ध को पृथक् रखकर उससे निकले ४ र्थ फलार्द्ध संस्कृत
मध्यमबुध से मन्दफल लाकर ।
कृत्वा तृतीय द्विःस्थाप्य मध्य, शैघ्रार्द्ध संगुणात्
अन्त्य शैघ्रार्द्ध (६८७) भक्तात्फलं त्र्यंशोनितं स्फुटम् । १२९ ।
उसे पुनः दो स्थान पर रखें, द्वितीय स्थान पर उसे शीघ्र फल के आधा से
गुणन करें । गुणन फल के अलग रखे शीघ्र फलार्ध से गुणा कर चतुर्थ प्रकार से
निकाले गये शीघ्र फलार्ध में भाग दें ।
मध्या तत्संस्कृतात् तुर्य फलमानीयत द्विधा ।
अधतृतीय कोष्ठूथ फलघ्ना त्रिज्य या हृतात् । १३० ।
फल का तृतीयांश (१/३) प्रथम स्थान में रखे मन्दफल से अन्तर करने पर
स्फुट मन्दफल होता है । इस स्फुट मन्द फल से मध्यम बुध का संस्कार कर
उससे पुनः चतुर्थ शीघ्र फल निकाले और दो स्थान में रखे । द्वितीय स्थान के
फल के तृतीय संस्कार के कोटिफल (मन्द को टिफल) से गुणा कर त्रिज्या (३४३८)
से भाग दें ।