सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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स्थान में कल्प तिथि क्षय (२५,०८,२२,५२,०००) से गुणा करें ।
हताः कल्पेन्दु घस्रामा लब्धावमविवर्जिताः ।
भवन्ति रविवारादि रवि मध्यम सावनाः । ८ ।
गुणनफल को कल्प तिथि (१६,०३,००,००,८०,०००) से भाग देने से इष्ट काल
तक तिथिक्षय निकलता है । इसे पहले स्थान की तिथियों से घटाने पर सावन
दिन संख्या (रविवार से आरम्भ) निकलती है । (सात से भाग देने पर शेष को
रविवार आदि से गिनने पर वार निकलता है) ।
वासराः कुदिनारूयास्ते गतालंकार्धरात्रतः ।
अत्राधिमासावमयोः शेष द्युघटिकादिकम् । ९ ।
यह वार सृष्टि आरम्भ में लंका की अर्धरात्रि से आरम्भ हुआ था । यहां
अधिमास लाने के लिए (केवल लब्धि का प्रयोग हुआ था) शेष (दिन घटी
आदि) को
न गृह्य तेऽधिमासस्तु शुद्धेः पूर्वं गतोयदि
तदाशेषांक भूयस्त्वादेकं लब्धेषु योजयेत् । १० ।
नहीं लिया गया था । शेष यदि भाजक के प्रायः समान हो या निकट अतीत
में ही एक अधिमास हुआ है तो लब्धि में एक जोड़कर कर शुद्ध अधिमास संख्या
ज्ञात करें ।
शुद्धौ सत्यां यदागामी शेषाल्पत्वात्ततस्त्यजे त्
तथा हनां वार वैषम्ये सैक व्येकत्वमिष्यते । ११ ।
यदि जल्द ही अधिमास आने वाला है या अधिमास शेष बहुत कम है तो
शुद्ध अधिमास के लिए एक घटायें । इसी प्रकार अहर्गण से वार निकालने में भी
एक का अन्तर पड़ सकता है ।
रवीन्दुस्पष्ट मानेन ग्राह्योयोस्तिथि मासयो
स्यात्सिद्धौ मध्य मानेन क्वचिदेकाधिकोनता । १२ ।
तिथि या मास में एक अन्तर होने का कारण है कि वर्तमान तिथि , मास
ग्रह की स्पष्ट गति (जो घटती बढ़ती है) के आधार पर हैं लेकिन गणना के लिए
एक कल्प में (सूर्य चन्द्र की) मध्यमगति का व्यवहार होता है ।
अथानीतैर्दिनैः साध्या दिन मासाब्द पालकाः
निर्गतोऽहर्गणः सैकः सप्त भक्तोऽवशेषकः । १३ ।
अहर्गण में (वर्तमान दिन के लिए ) १ जोडकर ७ का भाग देने से शेष के
अनुसार रविवार (१) आदि दिन आते हैं । (० शेष शनिवार) ठीक वार नहीं
आने पर शुद्ध अहर्गण के लिए १ जोड़ना या घटाना होगां ।