सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
कैलासो नाम तस्यैव महेशो यत्र तिष्ठति ।
अकुलाख्योऽविनाशी च क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥
( शिवसंहिता ५ । १८७ )
यह आकाशचक्र सहस्रार के सुमेरु पर स्थित है। इस आकाशचक्र ( कमल )
को सोलह दलों से युक्त कहा गया है, इसका मुख ऊपर की ओर है । इस कमल
के केन्द्र में त्रिकूटाकार सच्चिदानन्दमयी महाशक्ति परमात्मा शिव से परमोच्च
आत्माभिव्यक्ति प्रकट करती है । इसे आत्मानुभव का चरम स्थान पूर्णगिरि
पीठ भी कहा गया है। यहाँ प्रापंचिक चेतना पूर्णतया रूपान्तरित होकर स्वयं को
सर्वसमाहारी, सर्वसमायोजक, सर्वातिक्रामक चरम चेतना के रूप में अनुभव
करने लगती है । मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी शक्ति को अपने सर्वाधिक प्रियतम
शिव से पुनर्मिलन की पवित्र यात्रा इस चक्र में पहुँच कर अपना ध्येय प्राप्त कर
लेती है । योगी आत्मपूर्णता प्राप्त कर लेता है ।
गोरक्षशतक में गोरखनाथजी ने षट् चक्र ही निरूपित किये हैं ।
चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षट्दलम् ।
नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसंख्यादलं हृदि ॥
कण्ठे स्यात् षोडशदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा ।
सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे महापथे ॥
( गोरक्षशतक १५, १६ )
भ्रू मध्य में स्थित आज्ञा चक्र के ऊपर ब्रह्मरन्ध्र के महापथ में सहस्रार
कमल स्थित है ।
मत्स्येन्द्र नाथ ने भी छः चक्र बताये हैं और कंठचक्र के ऊपर छठां चक्र
ज्ञानचक्र कहा है । इस चक्र में योगी विश्राम करता है ।
ग्यांनं चक्रै लीजै विश्राम ।
( मच्छीन्द्रगोरषबोध ५४ )
'गोरखबानी' में अष्टचक्र ही महायोगी गोरखनाथ द्वारा वर्णित हैं ।
अष्टचक्र नामक लघु रचना में चक्रसाधना का स्वारस्य निरूपित है । यह
पूरी रचना इस तरह है—
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४६
ॐ गोरष देव अष्ट चक्र वोलिये घट भीतर । ये कौण-कौण
वोलिये । अवधू प्रथमें आधार चक्र वोलिये । गुदा अस्थांने, चत्र दल
कंवल, षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि द्रिष्ट चक्र, लिंग अस्थांने, षट्
दल कंवल षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि मणिपुर चक्र, नाभि अस्थांने,
दस दल कंवल, षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि अनहद चक्र, हिरदा
सथांने, द्वादश कंवल, षट सै साँस । तिस चक्र ऊपरि विसुध चक्र,
कंठसथांने, षोडश कंवल, एक सहंसर साँस । अजपा गायत्री पारब्रह्म
ध्यान । तिस चक्र ऊपरि अगनि चक्र, नेत्र सथांने षोडश दल कंवल
एक सहस्त्र साँस, अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि
गिनांन चक्र, ब्रह्मं'ड सथांने, एक सहंस्र दल कंवल एक सहस्र साँस ।
अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि सुछिम चक्र, विग्यांन
सथांने एक बीस सहस्र दल कंवल । ए अष्ट कमल का जांणौ भेव ।
आपै करता आपै देव । ( गोरखबानी अष्टचक्र )
स्पष्ट है कि महायोगी गोरखनाथ ने चक्र-साधना का परमफल स्वरूपाव-
स्थानपूर्वक परम शून्य में परमात्मा शिव का साक्षात्कार बताया है । चक्र
साधना की अन्तर्ज्योति से सम्पूर्ण अखण्ड, अनन्त, निरञ्जन सच्चिदानन्द में
आत्मा प्रतिष्ठित होकर परमात्मस्वरूप हो जाता है ।
सोलह आधार
अथ षोडशाधारः कथ्यते तत्र प्रथमं पदाङ्गुष्ठाधारं
तत्राग्रतस्तेजोमयं ध्यायेत् । दृष्टिः स्थिरा भवति ॥ १० ॥
अब यथाक्रम सोलह आधारों का निरूपण किया जाता है । पहला
पादांगुष्ठाधार है । उसके अग्रभाग में तेजोमय स्वरूप का ध्यान करना चाहिये,
इस ध्यान से दृष्टि स्थिर होती है ॥ १० ॥
विशेष—हमारे शरीर के भीतर अनेक तेजोमय स्थान अथवा केन्द्र हैं, जिन
का ध्यान करने से योगसाधक को अपने प्राण, मन और विन्दु के लय में बड़ी
सुविधा होती है । महायोगी गोरखनाथजी ने ऐसे प्रधान केन्द्रों को चक्र कहा
है और उपर्युक्त तेजोमय स्थानों को आधार कहा है, जो सोलह हैं । आधार
५० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
का शाब्दिक अर्थ है धारण करने वाला। आधार के माध्यम से जैविक तथा
मानसिक कार्यों के मुख्य स्थानों का संकेत मिलता है, जिन्हें स्वेच्छा से वश में
कर योगी आन्तरिक साधना में आगे बढ़ता है। प्रत्येक पद के अंगूठे में जैविक
कार्य का केन्द्र है। इस पर ध्यान केन्द्रित करने से नेत्र और पैर के अंगूठे तक
प्रवाहित तेज पर दृष्टि एकाग्र होती है। पैर के अंगूठे के तन्तुओं में और नेत्र
के स्नायुओं में तेजोमय सम्बन्ध है।
द्वितीयं मूलाधारसूत्रं वामपाष्णिाना निःपीडयितव्यम् ।
तत्राग्निदीपनं भवति ॥ ११ ॥
दूसरा मूलाधार है। इसके सीवन को बायें पैर की एड़ी से दबा कर
बैठना चाहिये। इससे शरीर में तेज की वृद्धि होती है। शरीर में स्थित अग्नि
प्रदीप्त होती है ॥ ११ ॥
विशेष—यह कुण्डलिनी शक्ति प्रथम आधार और सुषुम्ना नाड़ी का उद्गम
स्थान है। इसी स्थान पर सबसे पहले मानसिक और जैविक शक्ति को एकाग्र कर
सुषुम्ना मार्ग से ऊपर चढ़ाने—ऊर्ध्वमुखी करने का अभ्यास किया जाता है। अपने
बायें पैर की एड़ी से मूलाधार के सीवन को दबा कर बैठने से अग्निदीपन होता
है और शक्ति नीचे की ओर प्रवाहित न होकर ऊर्ध्वमुखी हो उठती है। शक्ति
का जागरण आरम्भ हो जाता है और वह आध्यात्मिक अथवा आत्ममुखी हो
जाती है, उसमें परमेश्वर शिव से मिलने की अभिलाषा तीव्र हो उठती है।
तृतीयं गुदाधारं विकाससंकोचनेन निराकुञ्चयेत् । अपान-
वायुः स्थिरो भवति ॥ २२ ॥
तीसरा गुदाधार है। इस स्थान पर गुदा का संकोच-विकास—आकुञ्चन और
संकोचन करना चाहिये । इस क्रिया से अपानवायु स्थिर हो जाती है ॥ १२ ॥
विशेष—गुदाधार की स्थिति गुदास्थान में बतायी जाती है। इस आधार
के द्वारा अपान वायु शरीर के मल और दोषपूर्ण गन्दगी को शरीर से बाहर
निकाल कर उदर को निर्मल करती है और प्राणवायु से ऐक्य स्थापित कर जैविक
और मानसिक शक्ति को विकसित करती है। इस कार्य की पूर्णता के लिये
साधक को गुदा का आकुञ्चन और संकोच करना—उसे सिकोड़ना और फैलाना
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५१
आवश्यक होता है। इससे अनेक उदरसम्बन्धी रोग दूर होते हैं तथा सहज रूप से
मूलबन्ध और उड्डियान बन्ध के अभ्यास का फल प्राप्त होता है, कुण्डलिनी शक्ति
ऊर्ध्वमुखी होती है और प्राणायाम की साधना संयत होती है।
चतुर्थं मेढ्राधारं लिङ्गसंकोचनेन ब्रह्मग्रन्थित्रयं भित्त्वा
भ्रमरगुहायां विश्रम्य तत ऊर्ध्वमुखे विन्दुस्तम्भनं भवति । एषा
वज्रोली प्रसिद्धा ॥ १३ ॥
चौथा मेढ़ ( लिंग )—आधार है। यहाँ लिंग का संकोचन कर ( योनि
मुद्रा की सहायता से ) वीर्य को ऊर्ध्वगामी करते हुए योगी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र—
तीन ग्रन्थियों का भेदन कर (मेरुदण्ड के सामने ग्रीवा के ऊपरी भाग में विद्यमान)
भ्रमर गुफा में वीर्य का स्तम्भन कर विश्राम करता है। ( वीर्य अधः पतित नहीं
होने पाता है।) यही वज्रोली क्रिया है। ( इसके प्रभाव से योगी अखण्ड ब्रह्म-
चर्य में स्थित होकर प्राण, मन और वीर्य—बिन्दु का पारस्परिक लय कर परम
पद में स्वस्थ हो जाता है।) यह वज्रोली क्रिया विशेष रूप से प्रसिद्ध
है ॥ १३ ॥
विशेष—योनि-मुद्रा के अभ्यास से सुप्त कुण्डलिनी शक्ति जाग कर ऊपर
उठती है और वीर्य ऊर्ध्वगामी होता है। इस योनि मुद्रा का विवरण महर्षि घेरण्ड
ने अपनी घेरण्डसंहिता में दिया है। सिद्धासन में स्थित होकर दोनों हाथ के अंगूठों
से कानों को, दोनों तर्जनी से नेत्रों को, मध्यमा से मुख को तथा अनामिका अंगुली
से नाक के छिद्र बन्द करना चाहिये। प्राण को काकीमुद्रा ( कौए की चोंच के
समान मुख को जिह्वा बाहर कर आकारित करना चाहिये और धीरे-धीरे वायु
का पान करना चाहिये।) से खींचकर अपान वायु से मिलाना चाहिये। देहस्थ
षट्चक्रों का ध्यान कर 'हूं' या 'हंस'—इन दोनों मन्त्रों से सुप्त कुण्डलिनी शक्ति
को जगाकर सहस्रार में स्थापित करना चाहिये । ऐसी भावना करनी चाहियेकि
मैं शिव के साथ शक्तिमय होकर परम सुख का आस्वादन कर रहा हूँ। यही
योनिमुद्रा है।
सिद्धासनं समासाद्य कर्णाचक्षुर्नासोमुखम् ।
अंगुष्ठतर्जनीमध्यानामाभिश्चैव साधयेत् ॥
काकोभिः प्राणं संकृष्य अपाने योजयेत् ततः।
५२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
षट्चक्राणि क्रमाद् ध्यात्वा हूं हंसमनुना सुधीः ॥
चैतन्यमानयेद् देवीं निद्रितां यां भुजङ्गिनीम् ।
जीवेन सहितां शक्तिं समुत्थाप्य कराम्बुजे ॥
शक्तिमयः स्वयं भूत्वा परशिवेन सङ्गमम् ।
नानासुखं विहारं च चिन्तयेत् परमं सुखम् ॥
( घेरण्डसंहिता ३।३७-४० )
गुदा से उपस्थ—मेढ्रपर्यन्त योनिदेश कहा जाता है। इसी का संकोचन कर
योनि-मुद्रा की क्रिया की जाती है। इस योनिमुद्रा तथा लिङ्ग के संकोच से साधक
तीन ग्रन्थियों-ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि का भेदन कर सहस्रार में
बिन्दु को ऊर्ध्वमुख कर शिव-शक्ति के तादात्म्य के आनन्द का उपभोग करता है।
तीनों ग्रन्थियों का भेदन कुण्डलिनी-जागरण की प्रक्रिया का एक अंग है।
अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वंगं कुरुते बलात् ॥
आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते ।
अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति ॥
प्राणस्थानं ततो वह्निः प्राणापानौ च सत्वरम् ।
मिलित्वा कुण्डलींयाति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः ॥
तेनाग्निना च संतप्ता पवनेनैव चालिता ।
प्रसार्य स्वशरीरं तु सुषुम्नावदनान्तरे ॥
ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्वा रजोगुणसमुद्भवम् ।
सुषुम्नावदने शीघ्रं विद्युल्लेखेवसंस्फुरेत् ॥
विष्णुग्रन्थिं प्रयात्युच्चैः सत्वरंहृदि संस्थिता।
ऊर्ध्वंगच्छति यच्चास्ते रुद्रग्रन्थिं तदुद्भवम् ॥
( योगकुण्डल्युपनिषत् १।६३-६८ )
अपानवायु का लिङ्गसंकोचन द्वारा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करना ही ब्रह्मग्रन्थि
का भेदन है, अपानका उठकर हृदयस्थ प्राण के आकर्षण से ऊर्ध्वमुख होना
विष्णुग्रन्थि का भेदन है और इस प्राणमयी महाशक्ति कुण्डलिनी के रूप में
आज्ञाचक्र का भेदन कर सहस्रार में पहुँचना ही रुद्रग्रन्थिका भेदन है। आज्ञाचक्र
में ही रुद्रग्रन्थि की स्थिति बतायी गयी है ।
बिन्दु को वज्रोली मुद्रा के अभ्यास द्वारा सहस्रार में भ्रमरगुफा में
पहुँचाने में मेढ्राधार की महती भूमिका है। वज्रोली मुद्रा की सिद्धि के सम्बन्ध में
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५३
हठयोगप्रदीपिका में निरूपण है कि बिन्दु को क्षरित होने से रोकने के लिए
उसे लिङ्ग के संकोच द्वारा ऊर्ध्वमुख करना चाहिये।
मेहनेन शनैः सम्यगूर्ध्वाकुञ्चनमभ्यसेत् ।
पुरुषोऽप्यथवा नारी वज्रोलीसिद्धिमाप्नुयात् ॥
( हठयोगप्रदीपिका ३।८५ )
वज्रोली के अभ्यास से योगी मृत्यु को जीत लेता है। वीर्य का स्खलन
अथवा क्षरण ही मृत्यु है और उसे शरीर में धारण करना ही जीवन है।
योगाभ्यास में निपुण योगी को उपस्थ—लिंग इन्द्रिय के छिद्र से ( वज्रोली की
विधि से ) वीर्य का ऊपर की ओर आकर्षण करना चाहिये अथवा योनिमुद्रा के
द्वारा अभ्यास करना चाहिये। वीर्य प्राण से संयुक्त है, इसलिये जैविक शक्ति,
मानसिक और बौद्धिक विकास तथा शारीरिक कान्ति की वृद्धि के लिये वज्रोली
के द्वारा वीर्य के ऊर्ध्वाकर्षण का अभ्यास सिद्ध होने पर योगी संकल्पसिद्ध हो
जाता है। मेढ्राधार में स्वाधिष्ठान चक्र अवस्थित है। स्व का अर्थ ही प्राण
होता है। भोगवासना की तृप्ति द्वारा वीर्य को स्खलित होने से बचाने के लिये
वज्रोली मुद्रा का अभ्यास करना अत्यावश्यक है। इससे प्राण-शक्ति ब्रह्मग्रन्थि,
विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि का भेदन कर शरीर को सौन्दर्य, बल और तेज
प्रदान करती है ।
पञ्चममोड्याणाधारयोर्बन्धनान्मलमूत्रसंकोचनं भवति ॥ १४ ॥
पाँचवां उड्डियाण आधार है। ( यह लिङ्ग मूल तथा नाभिमूल के मध्य
में स्थित है।) इस आधार के बन्ध—नियन्त्रण से मलमूत्र का संकोचन
( अल्पता ) होता है ॥ १४ ॥
विशेष--उड्डियाण आधार का नियन्त्रण करने से योगी अपनी आँतड़ियों
और मूतेन्द्रिय पर नियन्त्रण कर सकता है, इनके कष्टों का उपचार कर सकता
है। प्राण-शक्ति इस आधार की क्रिया और नियन्त्रण से ऊपर की ओर तेजी
से उठती है, मानो उड़ती है। इसके अभ्यास से नाभि-शुद्धि होती है, वायु की
शुद्धि होती है, जठरानल बढ़ता है, शरीर को पोषण मिलता है, रस का संचार
होता है। वृद्ध भी उड्डियान के बन्धाधार से तरुण हो जाता है। इस आधार
पर ही उड्डियान बन्ध की क्रिया पूरी होती है। नाभि के ऊपर-नीचे के भाग
५४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
में आकर्षण—तान करना चाहिये । छः मास में ही मृत्यु पर साधक विजय प्राप्त
कर लेता है ।
बद्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः ।
तस्मादुड्डीयनाख्योऽयं योगिभिः समुदाहृतः ।
( हठयोगप्रदीपिका ३ । ५५ )
जिस बन्ध से बद्ध प्राण उड़कर ( सहज ऊर्ध्वमुख होकर ) सुषुम्ना नाड़ी में
पहुँच जाता है, वही योगियों द्वारा उड्डियान बन्ध कहा जाता है ।
उदरे पश्चिमं तानं नाभेरुर्ध्वं च कारयेत् ।
उड्डीयानो ह्यसौ बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी ॥
( हठयोगप्रदीपिका ३ । ५७ )
नाभि में ऊपर और नीचे उदर में पीछे की ओर इसतरह आकर्षण करे कि
दोनों भाग पीछे पीठ तक पहुँच जायं, यह बन्ध मृत्युरूपी हाथी के लिये साक्षात्
सिंह के समान है ।
षष्ठे नाभ्याधार ओङ्कारमेकचित्तेनोच्चारिते नादलयो
भवति ॥ १५ ॥
छठाँ नाभि-आधार है । इसमें एकाग्रचित्त से ॐकार के उच्चारण से नादलय
होता है ॥ १५ ॥
विशेष—नाभि के मूल में एकाग्र मन से प्रणव का ध्यान करने से नादलय
उत्पन्न होता है । मूलाधार में स्थित बिंदुरूपा पराशक्ति से उद्भूत शब्द ही
नाद है । यह बीजांकुर के समान सूक्ष्म है । नाभि-आधार मणिपुर चक्र का स्थान
है । जैविक कार्य का यह एक प्रमुख केन्द्र है । यहाँ सूक्ष्म नाद की अभिव्यक्ति ही
शब्द ब्रह्म है । यह नाद ही अपरिवर्तनीय ( शाश्वत ) पारमार्थिक परम चैतन्य
है । यही शब्द ब्रह्म है, जो मूलाधार में सूक्ष्म नादरूप में अभिव्यक्त होता है,
यह शक्ति से अभिन्न होता है, यह विन्दु या बीज से तादात्म्य प्राप्त कर लेता
है । मूलाधार में नादशक्ति से तदाकार रहता है । स्वाधिष्ठान में यह विन्दु
या बीज से तद्रूप होता है और मणिपुर चक्र या नाभि-आधार में सूक्ष्म-क्रमिक
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५५
नाद के रूप में प्रकट होता है। योगी इसे योगदृष्टि से देख सकता है। यह
प्रणव, ॐ की शाश्वत और मधुर एकरस ध्वनि है।
अक्षरः परमो नादः शब्दब्रह्मेति कथ्यते।
मूलाधारगता शक्तिः स्वाधारा विन्दुरूपिणी
तस्यां उत्पद्यते नादः सूक्ष्मबोजादिवाङ्कुरः।
तां पश्यन्तीं विदुर्विश्वं यया पश्यन्ति योगिनः ।
( योगशिखोपनिषद् ३ १२-३)
महायोगी गोरखनाथजी ने नाभि आधार में शुद्ध नाद पर ध्यान केन्द्रित
करने पर विशेष बल दिया है। इसका अभ्यास कान के छिद्र अंगुलियों से बन्द
कर ॐ के उच्चारण द्वारा किया जा सकता है।
सप्तमे हृदयाधारे प्राणं निरोधयेत् कमलविकासो
भवति ॥ १६ ॥
सातवाँ हृदयाधार है। इसमें प्राणवायु के निरोध ( संयमन ) से अष्टदल
कमल ( अनाहत चक्र ) का विकास होता है ।। १६ ।।
विशेष—प्राणवायु का स्थान हृदय है। हृदय-आधार में प्राणशक्ति को
संयमित करने से अनाहत चक्र, जो अधोमुख अष्टदल कमल है, ऊर्ध्वमुख होकर
खिल जाता है। अधोमुख कमल का तात्पर्य है जीवात्मा साधक की संसार के
विषय-सुख की कामनापूर्ति की आसक्ति और इस अष्टदल कमल के ऊर्ध्वमुख
खिलने का तात्पर्य है जीवात्मा साधक की परमात्ममुखी आध्यात्मिक उन्नति।
( महायोगी गोरखनाथजी ने 'गोरक्षशतक' आदि रचनाओं में इस अनाहत चक्र
को द्वादशदल कमल कहा है ।) हृदयाधार में प्राणशक्ति कुण्डलिनी विष्णुग्रन्थि
का भेदन कर ऊपर उठ जाती है। हृदय-आधार जैविक कार्य का महत्वपूर्ण स्थान
है, यह प्राण-अपान वायुओं के ऐक्य का स्थान है। समस्त ध्वनियों से ध्यान को
हटाकर यदि इस हृदय-आधार पर केन्द्रित किया जाय तो अनाहत नाद का
स्पष्ट श्रवण होता है। कुम्भक प्राणायाम की विधि से इस आधार में प्राण
को केन्द्रित करने से योगी की लोकोत्तरानन्दप्राप्ति की यात्रा विशेष गतिमयी हो
जाती है।
५६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
अष्टमे कण्ठाधारे कण्ठमूलं चिबुकेन निरोधयेदिडापिङ्गल-
योर्वायुः स्थिरो भवति ॥ १७ ॥
आठवाँ कण्ठाधार है। कण्ठमूल को चिबुक ( ठोडी ) से निरुद्ध कर
( जालन्धरबन्ध के अभ्यास द्वारा ) इडा और पिंगला - चन्द्रनाड़ी और सूर्यनाड़ी
में वायु को स्थिर किया जाता है। ( यही कुम्भक प्राणायाम की सिद्धि है। )
इस अभ्यास से वायु स्थिर होती है ॥ १७ ॥
विशेष-चिबुक से कण्ठमूल का निरोध होने पर सहस्रार से द्रवित
चन्द्रामृत नाभिस्थानीय अग्नि ( सूर्य के मुख ) में गिरकर नष्ट नहीं होता और
योगसाधक उस अमृत का स्वयं पान कर शरीर को जीर्ण-शीर्ण होने से बचा लेता
है। इस तरह कण्ठमूल के निरोधपूर्वक चिबुक के वक्षःस्थल पर लग जाने से
जालन्धर बन्ध सिद्ध होता है। मूल बन्ध, उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध के
अभ्यास हठयोग की साधना में अथवा प्राणायाम की सिद्धि में अमित उपयोगी हैं।
कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेच्चिबुकं दृढम् ।
बन्धो जालन्धराख्योऽयं जरामृत्युविनाशकः ॥
बध्नाति हि शिरोजालमधोगामिनभोजलम् ।
ततो जालन्धरो बन्धः कण्ठदुःखौघनाशनः ॥
जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे ।
न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति ॥
कण्ठसंकोचनेनैव द्वे नाड्यो स्तम्भयेद् दृढम् ॥
मध्यचक्रमिदं ज्ञेयं षोडशाधारबन्धनम् ॥
( हठयोगप्रदीपिका ३।७०-७३ )
कंठ ( गले के विवर ) को संकुचित कर ( सिकोड़ कर ) साधक को
हृदय-देश में ( वक्ष के समीप चार अंगुल की दूरी पर ) ठोड़ी को दृढ़तापूर्वक
स्थापित ( स्थित ) करना चाहिये। यह जरा ( बुढ़ापा ) और मृत्यु (के भय)
को नष्ट कर देनेवाला जालन्धर नामक बन्ध है। यह नाड़ियों के समूह और
नीचे की ओर गिरनेवाले कपालकुहर के जल-अमृत को बाँधता ( रोकता ) है,
इसलिये यह जालन्धरबन्ध गले के रोगों--विकारों को नष्ट करता है। जालन्धर
बन्ध के अभ्यास से और गले को सिकोड़ने से न तो ( कपाल-कुहर का ) अमृत
अग्नि ( जठरानल ) में गिरता है और न वायु ही दूषित होती है। कंठ का
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५७
संकोच करने से इड़ा और पिंगला नाड़ियों का स्तम्भन हो जाता है, प्राण
सुषुम्ना से प्रवाहित होते हुए ऊर्ध्वमुख होता है। यह कण्ठाधार सोलहों आधारों
के बन्धनकर्ता मध्यचक्र-अथवा विशुद्धचक्र का स्थान है।
जालन्धर बन्ध के अभ्यास द्वारा साधक इड़ा-पिंगला में प्राणवायु के
संचालन पर नियन्त्रण कर मानसिक-जैविक शक्ति को सुषुम्ना-मार्ग से ऊर्ध्वमुखीकर
सकता है।
नवमे घण्टिकांधारे जिह्वाग्रं धारयेदमृतकला
स्रवति ॥ १८ ॥
नौवां घण्टिका आधार है। ( मुख के भीतर तालु में लटकनेवाले काग
का नाम घण्टिका है । ) घण्टिका-आधार के मूल भाग में जिह्वा के अग्रभाग को
लगाना चाहिये । वहाँ ( सहस्रार कमल में स्थित चन्द्रमण्डल से ) अमृत का
स्राव होता है--( उस अमृत का पान करने से शरीर नीरोग और पुष्ट होता
है ) ॥ १८ ॥
ब्रह्मारन्ध्रे हि यत् पद्मं सहस्रारं व्यवस्थितम् ।
तत्र कन्दे हि या योनिस्तस्यां चन्द्रो व्यवस्थितः ॥
त्रिकोणाकारतस्तस्याः सुधा क्षरति सन्ततम् ।
इडायाममृतं तत्र समं स्रवति चन्द्रमा ॥
( शिवसंहिता ५ । १२६-१३० )
ब्रह्मारन्ध्र में सहस्रदल कमल है, इसके कन्द की योनि में चन्द्रमा है। इस
त्रिकोणाकार योनि से चन्द्रमा से सुधा का स्राव होता रहता है, जो सदा अमृत
धारा के रूप में इडा नाड़ी से प्रवाहित होता हैं। जिह्वा के मूल में एक सूक्ष्म मार्ग
है, उसी से यह अमृतकला टपकती है। यह इडा-पिंगला के द्वारा शरीर में निम्न
स्तर पर उतर कर नष्ट हो जाती है। जिह्वा को मोड़कर इस अमृत का संस्पर्श
कराना ही अमृतपान है, इससे घण्टिका आधार में जिह्वा के अग्र भाग से साधक
निरन्तर प्रवाहित अमृत का पान करता रहता है ।
दशमे ताल्वाधारे ताल्वन्तर्गर्भे लम्बिकां चालनदोहनाभ्यां
दीर्घीकृतवा विपरीतेन प्रवेशयेत् काष्ठी भवति ॥ १९ ॥
५८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
दसवाँ तालु आधार है। यह घण्टिका (घाँटी) से ऊपर है। तालु के
भीतर छिद्र-मार्ग से जीभ को चालन-दोहन-क्रिया से लम्बी कर उस छिद्र में उलट
कर प्रविष्ट करना चाहिये। (इससे खेचरी मुद्रा की सिद्धि होती है।) साधक
काठ के समान निश्चल हो जाता है। (इससे अमृतपान और खेचरी मुद्रा
का अभ्यास, दोनों सिद्ध होते हैं।) योगसाधक का काठ के समान निश्चल हो
जाना ही जड़समाधि है ॥ १६॥
विशेष—तालु आधार को तालुचक्र, दसवाँ द्वार, शंखिनी-विवर अथवा
अमृतस्राव-केन्द्र कहा जाता है। यह तालु आधार जीभ के अधिक गहरे क्षेत्र में
स्थित है। यह आन्तरिक रूप से आज्ञाचक्र और सहस्रार से जुड़ा है। खेचरी
मुद्रा के अभ्यास की सिद्धि के लिये जीभ को विधिपूर्वक कोमल बना कर बाहर
खींचते हुए लम्बा करना चाहिये, इसके बाद जीभ के अग्रभाग को जिह्वा के मूल
के कोमल छिद्र में प्रवेश कराया जाता है। साधक इस क्रिया के द्वारा समस्त बाह्य
चञ्चलता से रहित होकर काठ के समान जड़—निश्चल हो जाता है। यह जड़-
समाधि है और इस संज्ञा-शून्य स्थिति में भी सहस्रार से स्रवित अमृत के निरन्तर
पान से उसकी चेतना रसमयी—आनन्दमयी बनी रहती है।
खेचरी मुद्रा का लक्षण यह है कि कपाल के मध्यवाले छिद्र में जीभ उलटी
प्रविष्ट करनी चाहिये और साधक की दृष्टि दोनों भौंहों के मध्य स्थित रहनी
चाहिये। जीभ को इस मुद्रा की सिद्धि के लिये चालन-दोहन क्रिया से लम्बा
किया जाता है। अँगूठे और तर्जनी अँगुली से जीभ को दायें-बायें चालित करना
चालन-क्रिया है और जिस तरह गाय के स्तन में अँगुलियों को लगा कर दूध दुहा
जाता है, उसी तरह अंगूठे और तर्जनी अँगुली से जीभ को धीरे-धीरे बाहर की
ओर खींचकर बढ़ाया जाता है, यह दोहन-क्रिया है। अँगुलियों में इस क्रिया के
लिये मक्खन या घी लगा लेना चाहिये। निरन्तर अभ्यास करने से जीभ इतनी
लम्बी हो जाती है कि वह भ्रू-मध्य तक पहुँचकर कपाल-रन्ध्र से लग जाती है।
भ्रुवोरन्तर्गतां दृष्टिं विधाय सुदृढ़ां सुधीः ॥
उपविश्यासने वज्रे नानोपद्रववर्जितः।
लम्बिकोर्ध्वस्थितेगर्ते रसनां विपरीतगाम् ॥
संयोजयेत् प्रयत्नेन सुधाकूपे विचक्षणः।
मुद्रैषा खेचरीप्रोक्ता भक्तानामनुरोधतः॥
(शिवसंहिता ४। ५१-५३)
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५६
जीभ को उलट कर इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा वाले संगम-त्रिपथ में लगाना
चाहिये, यह व्योमचक्र है, यही खेचरी मुद्रा है।
कलां पराङ्मुखीं कृत्वा त्रिपथे परियोजयेत् ।
सा भवेत्खेचरी मुद्रा व्योमचक्रं तदुच्यते ॥
चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे गता।
तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा सिद्धैर्निरूपिता ॥
ऊर्ध्वजिह्वः स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति यः।
मासार्धेन न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित् ॥
( हठयोगप्रदीपिका ३। ३७, ४१, ४४ )
तालु के ऊपर विवर में ऊर्ध्वमुखी जीभ से सहस्रार से क्षरित चन्द्रामृत का
तालु-आधार में पान कर योगी पन्द्रह दिनों में ही मृत्यु के भय से रहित हो
जाता है।
एकादशमथ जिह्वाधारं तत्र जिह्वाग्रं धारयेत् सर्वरोग-
नाशो भवति ॥ २० ॥
ग्यारहवाँ जिह्वाधार है। जिह्वामूल में जिह्वा के अग्रभाग को लगाना
(स्पर्शपूर्वक स्थिर करना) चाहिये। इस अभ्यास से (साधक के) समस्त
रोगों का नाश होता है ॥ २० ॥
द्वादशं भ्रूमध्याधारं तत्र चन्द्रमण्डलं धारयेत्, शीतलतां
याति ॥ २१ ॥
बारहवाँ भ्रूमध्याधार है। वहाँ चन्द्रमण्डल का ध्यान करना चाहिये, उसकी
धारणा करने से-ध्यान करने से साधक का अङ्ग शीतल-हृष्टपुष्ट और
प्रसन्नतायुक्त होता है ॥ २१ ॥
विशेष—दोनों भृकुटियों का मिलन-स्थान ही भ्रूमध्याधार है, यह आज्ञा
चक्र का स्थान है। यहाँ दृष्टि एकाग्र कर जब साधक शुभ्र, स्वच्छ-निर्मल चन्द्र-,
मण्डल का ध्यान करता है, तब उसका शरीर सौम्य, शान्त और स्थिर हो जाता
है। इस स्थान से मन विशेष रूप से अमनस्क की भूमिका में पहुँच जाता है,
६० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
इस आधार में दृष्टि की स्थिरता से साधक परम दिव्य ज्योति का दर्शन
करता है।
त्रयोदशं नासाधारं तस्याग्रं लक्षयेन्मनः स्थिरं भवेत् ॥ २२ ॥
तेरहवाँ नासिकाधार है, इसके अग्रभाग में दृष्टि एकाग्र कर ध्यान केन्द्रित
करने से मन स्थिर होता है—अपने चञ्चल स्वभाव को छोड़ कर आत्मस्वरूप में
स्थिर हो जाता है ॥ २२ ॥
विशेष—नासाधार का स्थान नासिका में होता है। नासिका जैविक कार्यों
का महत्वपूर्ण केन्द्र है। योगसाधना की सिद्धि के लिये नासाग्रदृष्टिस्थिरता और
नासाग्रध्यान का योगशास्त्र में विशद विवेचन उपलब्ध होता है। इससे मन की
उद्विग्नता नष्ट हो जाती है और वह गहन समाधि के योग्य हो जाता है।
चतुर्दशं नासामूलक कपाटाधारं तत्र दृष्टिं धारयेत्
षण्मासाज्ज्योतिःपुञ्जं पश्यति ॥ २३ ॥
चौदहवाँ नासामूलक कपाटाधार है, वहाँ दृष्टि स्थिर करनी चाहिये, इससे
छः मास में साधक को (परमात्म) ज्योतिपुञ्ज का दर्शन होता है ॥ २३ ॥
विशेष—कपाटाधार की स्थिति नासामूल में है। यह स्थान भ्रू चक्र—
आज्ञाचक्र के समीप है। इस आधार में दृष्टि और ध्यान को केन्द्रित करने से
सम्पूर्ण मनोमय जगत् प्रकाशित हो उठता है और विज्ञानमय कोष में मन के
विलीन अथवा तल्लीन होने पर परमात्म-ज्योति-पुञ्ज का साधक दर्शन करता
है, यह अन्तर्ज्योति का दर्शन है।
पञ्चदशं ललाटाधारं तत्र ज्योतिःपुञ्जं लक्षयेत् तेजस्वी
भवति ॥ २४ ॥
पन्द्रहवाँ ललाट-आधार है। उसमें ज्योतिः पुञ्ज को लक्ष्य बनाकर उसका
ध्यान करना चाहिये। इस ध्यान से योगी तेजस्वी होता है—दिव्यता को प्राप्त
होता है ॥ २४ ॥
विशेष—ललाटाधार ललाट के मध्य में है। यहाँ स्वतः प्रकाशित ज्योतिः-
पुञ्ज पर ध्यान केन्द्रित करने के लिये साधक को समाधि लगानी होती है। इस
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६१
ध्यान के फलस्वरूप उसकी जैविक और मानसिक शक्ति विकसित होती है, उसका
शरीर तेजोमय और कान्तियुक्त हो जाता है ।
अवशिष्टे षोडशे ब्रह्मरन्ध्र आकाशचक्रं तत्र श्रीगुरुचरणा-
म्बुजयुग्मं सदावलोकयेदाकाशवत्पूर्णो भवति । इति षोडशा-
धारः ॥ २५ ॥
शेष सोलहवाँ ब्रह्मरन्ध्र आधार है । यह आकाशचक्र का स्थान है । इसमें
श्रीगुरुके दोनों चरण-कमलों का ध्यान करना चाहिये । इससे साधक आकाश की
तरह पूर्ण रूप से ( निरवच्छिन्न सच्चिदानन्दस्वरूप गुरुतत्व का ध्यान करने
से ) व्यापक—मुक्त हो जाता है ॥ २५ ॥
विशेष—ब्रह्मरन्ध्र आधार में आकाशचक्र ही गुरु-स्वरूप के ध्यान के लिये
उपयुक्त स्थान स्वीकार किया गया है, इस आधार में गुरु के चरण का ध्यान करने
से उनकी प्रसन्नता से परमात्म-ज्योति अभिव्यक्त हो उठती है । इस स्थान में जब
मानसिक और जैविक शक्तियों का उच्च से उच्चतर स्तर की समाधि द्वारा
साधक पूर्ण न्यास ( संस्थापन ) करता है, तब उसे गुरु का प्रसाद ( प्रसन्नता )
प्राप्त होता है । गुरु अपने स्वरूप में सच्चिदानन्दविग्रह है और व्यष्टिरूप में
शिवशक्ति का रूप है । योगसाधक गुरु के प्रसाद से शाश्वत, सनातन, अलख-
निरञ्जन, कैवल्यपद-स्वरूपावस्थित हो जाता है । आकाशचक्र पूर्ण-गिरि-पीठ
है, इसमें साधक परमशून्य परमात्मरूप में तादात्म्य-लाभ कर गुरु के प्रसाद से
साक्षात् शिवस्वरूप हो जाता है । गुरु के चरण-कमल का ध्यान करने से
उसका सदुपदेशामृत सहज प्राप्त होता है ।
भवेद् वीर्यवती विद्या गुरुवक्त्रसमुद्भवा ।
( शिवसंहिता ३ । ११ )
गुरु का स्वरूप नादविन्दु-कलातीत होने पर सम्पूर्ण स्वानन्द-विग्रह होता
है और रूप नादविन्दुकलात्मा होने पर शिवस्वरूप होता है । दोनों स्वरूपों में
पूर्ण तादात्म्य है । गुरु के चरण-कमल का ध्यान ब्रह्मरन्ध्राधार में पूर्ण विहित है,
इससे साधक निरञ्जन पद प्राप्त करता है ।
नमः शिवाय गुरवे नादविन्दुकलात्मने ।
निरञ्जनपदं याति नित्यं यत्र परायणः ।।
( हठयोगप्रदीपिका ४ । १ )
६२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
महायोगो गोरखनाथ ने अपनी 'गोरक्षशतक' रचना के प्रारम्भ में दो
श्लोकों में गुरु का ध्यान किया है, वन्दन किया है, पहले श्लोक में गुरु के स्वानन्द
विग्रह का ध्यान है, दूसरे में समस्त योगज्ञान में पारंगत परम गुरु मत्स्येन्द्रनाथ
की बन्दना है ।
श्रीगुरुं परमानन्दं वन्दे स्वानन्दविग्रहम् ।
यस्य सान्निध्यमात्रेण चिदानन्दायते तनुः ॥
अन्तर्निश्चलितात्मदीपकलिका स्वाधारवेधादिभि ।
र्यो योगी युगकल्पकालकलनातत्वं च जेगीयते ॥
ज्ञानामोदमहोदधिः समभवद् यत्रादिनाथः स्वयं ।
व्यक्ताव्यक्तगुणाधिकं तमनिशं श्रीमीननाथं भजे ॥
( गोरक्षशतक १-२ )
गुरु साक्षात् आदिनाथस्वरूप है, इस भाव के द्वारा उन्होंने मत्स्येन्द्रनाथ
(मीननाथ) के चरण-कमल का चिन्तन किया है । गोरखनाथजी ने गुरु-
चरणकमल की वन्दना से आत्मब्रह्मदर्शन किया है ।
प्रथमें प्रणऊँ गुर के पाया । जिन मोहि आत्मब्रह्म लखाया ।
सतगुरु सवद कह्या तैं बूझया । तूहूँ लोक दीपकमनि सूझया ॥
( गो० वा० प्राणसंकली १ )
गोरखनाथजी ने इस तरह स्वीकार किया है कि सबसे पहले मैं गुरुदेव
(योगिराजेश्वर मत्स्येन्द्र नाथ) के चरण (कमल) में प्रणाम करता हूँ,
जिन्होंने (कृपापूर्वक) मुझे अपने ही शरीर में विद्यमान आत्मब्रह्म, अलख
निरञ्जन परम शिव का (ज्ञाननेत्र से) साक्षात्कार अथवा दर्शन कराया ।
सद्गुरु के शब्द उपदेशामृत) से मुझे (ज्ञान-) दीपमणि की प्राप्ति हो गयी
और तीनों लोक मेरे ज्ञाननेत्र में प्रकाशित हो गये ।
इस तरह सोलह आधारों के योग-साधनापरक ध्यान का वर्णन किया गया ।
तीन लक्ष्य
अथ लक्ष्यत्रयन्तत्रतावदन्तर्लक्ष्यं कथ्यते । मूलकन्दाद्
दण्डलग्नां ब्रह्मनाड़ीं श्वेतवर्णां ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं गतां संस्मरेत्
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६३
तन्मध्ये कमलतन्तुनिभां विद्युत्कोटिप्रभामूर्ध्वगामिनीं तां मूर्तिं
मनसा ध्यायेत् तत्र सर्वसिद्धिदा भवति ॥ २६ ॥
( मन को स्थिर करने के उपाय का निरूपण किया जाता है । मन को वश
मे करने से इष्ट की—अभिलषित ध्येय की सिद्धि होती है ।) अन्तर, बहिः और
मध्य के भेद से तीन प्रकार से लक्ष्यों का वर्णन किया जाता है । (अन्तर लक्ष्य
का वर्णन है। मूल कन्द मेढ्र के ऊपरी भाग और नाभि के नीचे पक्षी के अण्डे
के समान स्थित है । इस मूलकन्द से बहत्तर हजार नाड़ियों की उत्पत्ति कही
गयी है । ) मूलकन्द से सहस्रार पर्यन्त मेरुदण्ड में श्वेतवर्ण की ब्रह्मनाड़ी सुषुम्ना
का ध्यान करना चाहिये, उस सुषुम्ना में कमल-तन्तु के समान करोड़ों
बिजलियों के समान प्रकाशमयी ऊर्ध्वगामिनी कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करना
चाहिये । इस ध्यान से कुण्डलिनी समस्त सिद्धियों को प्रदान करती है ॥ २६ ॥
विशेष—महायोगी गोरखनाथजी की दृष्टि में लक्ष्य वे विषय हैं, जिनपर
मानसिक-जैविक शक्ति को उच्चतम आध्यात्मिक स्तर पर उठाने और ब्रह्माण्ड
तथा व्यष्टि-शरीर में परमात्म-सत्ता का दर्शन करने के लिये अस्थायी रूप
से ध्यान केन्द्रित किया जाता है । समाधि या धारणा के चुने हुए पदार्थ की
स्थिति के अनुसार भीतरी, बाहरी और मध्य, तीन तरह के लक्ष्य निरूपित हैं ।
सुषुम्ना नाड़ी में कुण्डलिनी शक्ति पर ध्यान केन्द्रित करना अन्तर्लक्ष्य-साधना है ।
यह कुण्डलिनी इस तरह लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करने वाले योगसाधक को
महेश्वरी महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में अभिव्यक्त होकर
अनेक प्रकार के आध्यात्मिक और लौकिक वरदान तथा सिद्धियाँ प्रदान करती है ।
शिवस्वरूप में तादात्म्य होने पर वह साधक को दिव्य स्वरूप में अवस्थित कर
देती है । जब मन आन्तरिक आत्मा पर केन्द्रित हो जाता है, तब न केवल मन
ही, प्रत्युत शरीर भी इसके आध्यात्मिक स्वरूप के प्रकट हो जाने पर दिव्य हो
जाता है ।
अथवा ललाटोर्ध्वे गोल्लातमण्डपे स्फुरदाकारं लक्षयेदथवा
भ्रमरगुहामध्य आरक्तभ्रमराकारं लक्षयेदथवा कर्णद्वयं तर्जनीभ्यां
निरोधयेत् ततः शिरोमध्ये धूं धूं कारं नादं शृणोत्यथवा
चक्षुर्मध्ये नीलज्योतिरूपं पुतल्याकार लक्षयेदित्यन्त-
र्लक्ष्यम् ॥ २७ ॥
६४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
मस्तक के ऊपर का भाग गोल्लाट है। गोल्लाट के चल आकार का ध्यान
करना चाहिये अथवा मेरुदण्ड के सम्मुख ग्रीवा से ऊपर का स्थान भ्रमर
गुफा कहा जाता है। इस भ्रमरगुफा में लाल रंग के भ्रमर के आकार का ध्यान
करना चाहिये अथवा दोनों कानों के छिद्रों को दोनों तर्जनी अँगुलियों से यथाक्रम
आच्छादित (निरुद्ध) करना चाहिये, इससे सिर के मध्य भाग में धूं धूं कार
नाद (शब्द) का श्रवण होता है अथवा नेत्रों में नीली ज्योति वाली पुतली के
आकार का ध्यान करना चाहिये। यही अन्तर्लक्ष्य का निरूपण है ॥ २७ ॥
विशेष—गोल्लाट केन्द्र सहस्रार में ललाट के ठीक ऊपर है। इसमें एक
ज्योतिःपुंज प्रज्वलित है। इस पर मन को केन्द्रित करने से साधक की चेतना
दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठेगी, उसका व्यक्तित्व आध्यात्मिक ज्योति से
दिव्य हो जाता है। भ्रमर गुफा स्नायुदण्ड या रीढ़-संस्थान के ऊपर सहस्रार
के पृष्ठ भाग में स्थित है। इस स्थान में साधक अपने वीर्य को ऊर्ध्वगामी
कर सुरक्षित रखता है, इस भ्रमर गुफा में ध्यान केन्द्रित करने से योगसाधक
को काम, कामवासनायें और इन्द्रियों की उत्तेजनायें नहीं सताती हैं, वह शान्त,
स्थिर और मुक्त रहता है। इस केन्द्र में जीवन अथवा प्राणशक्ति को लाल रंग
के भ्रमर के आकार की तरह कल्पित कर ध्यान केन्द्रित कर दिव्य आनन्द का
अनुभव किया जाता है। योगी को अमृतत्व प्राप्त होता है, वह शिव-शक्ति
तादात्म्य अनुभव करता है। मस्तक के भीतर धूं धूं कार नाद पर ध्यान केन्द्रित
करने से यह नाद ओंकार का रूप ग्रहण कर लेता है, इस नाद के श्रवण के
फलस्वरूप योगी अलखनिरंजन का साक्षात्कार करता है। नेत्रों से आन्तरिक केन्द्र
में नीली ज्योति पर ध्यान केन्द्रित करने से योगसाधक की चेतना और व्यक्तित्व
में दिव्यता भर उठती है।
बहिर्लक्ष्यं कथ्यते नासाग्राद् बहिरङ्गुलद्वयमारक्तं
तेजस्तत्वं लक्षयेदथवा दशाङ्गुले कल्लोलवदप्तत्वं लक्षयेदथवा
नासाग्रद् वा दशाङ्गुले पीतवर्णं पार्थिवतत्त्वं लक्षयेदथवा
काशमुखं दृष्ट्वाऽवलोकयेत् किरणानाकुलितं पश्यति सर्वं
निर्मलीकरणमथोध्वंदृष्ट्यन्तरालं लक्षयेज्ज्योतिर्मुखानि
पश्यत्यथवा तदभ्यन्तरं तत्राकाशं लक्षयेदाकाशसदृशचित्तं
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६५
मुक्तिप्रदं भवत्यथवा दृष्ट्यन्तस्तप्तकाञ्चनसन्निभां भूमिं लक्षयेद्
दृष्टि : स्थिरा भवति । इत्यनेकविध बहिर्लक्ष्यम् ॥ २८ ॥
बाहरी लक्ष्य का निरूपण किया जाता है । नासिका के अग्रभाग में दो अंगुल
आगे लाल रंग के तेज का ध्यान करना चाहिये अथवा नासिका से दस अंगुल आगे
तरंगयुक्त श्वेत वर्ण के जलतत्व का ध्यान करना चाहिये अथवा नासाग्र से द्वादश
अंगुल की दूरी पर पीले रंग के पृथ्वीतत्व का ध्यान करना चाहिये अथवा आकाश
के सम्मुख दृष्टि कर आकाश का ध्यान करना चाहिये । इस तरह साधक ज्योतिः
पुंज को देखता है, जिससे चित्त आकाश की तरह निर्मल और व्यापक हो जाता
है अथवा ऊपर आकाश की ओर दृष्टि कर आकाश का ध्यान करने से चित्त
आकाश की तरह मुक्तिप्रद हो जाता है अथवा दृष्टि को अन्तर्मुखी कर तप्त सोने
की रंगवाली पृथ्वी का ध्यान करने से दृष्टि स्थिर होती है । इस तरह अनेक
बहिर्लक्ष्य पर ध्यान एकाग्र करने का वर्णन किया गया ॥ २८ ॥
विशेष--खुले नेत्र से साधक अपने मन को बाह्य जगत् की समस्त
विभिन्नताओं से मुक्त कर अपनी एकाग्र शक्ति से स्वर्णिम ज्योति के विशाल क्षेत्र
में संयमित कर परमात्मा के दिव्य साक्षात्कार से अपने-आप को कृतार्थ कर
सकता है । समस्त बाह्य तत्वों ( पदार्थों ) में मन की एकाग्रता द्वारा साधक
परमात्मा की अभिव्यक्ति का अनुभव करता है , बाह्य लक्ष्य दृष्टि की स्थिरता
अथवा मन की एकाग्रता अथवा ध्यान की तल्लीनता की यही सार्थकता है । वाह्य
लक्ष्य में सूर्य, चन्द्र, विशेष तारा, नक्षत्र, ग्रह, जलते दीपक, प्रज्वलित अग्नि,
दिव्य प्रतिमा, पूज्य व्यक्ति के चित्र आदि पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये ।
अथ मध्यमं लक्ष्यं कथ्यते श्वेतवर्णं वा रक्तवर्णं वा
कृष्णवर्णं वाग्निशिखाकारं वा ज्योतीरूपं वा विद्युदाकारं
वा सूर्यमण्डलाकारं वार्धचन्द्राकारं वा यथेष्टं स्वपिण्डमात्रं
स्थानवर्जितं मनसा लक्षयेदित्यनेकविधं मध्यमं लक्ष्यम् ॥ २६ ॥
मध्य लक्ष्य का निरूपण किया जाता है । इसमें स्थानविशेष पर लक्ष्य पर
ध्यान केन्द्रित नहीं किया जाता है, किसी श्वेतरंग या लालरंग या काले रंग के
पदार्थ पर अथवा अग्निशिखा के आकार वाले पदार्थ पर अथवा ज्योति अथवा
विद्युत् के ( समान प्रभावुक्त ) आकार अथवा सूर्यमण्डलाकार अथवा अर्धचन्द्राकार
६६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
अथवा अपने शरीर में ही यथेष्ट अंग पर मन को एकाग्र—स्थिर कर ( बिना किसी
स्थान विशेष की कल्पना के ही ) ध्यान को केन्द्रित करना चाहिये । इस तरह
अनेक प्रकार के मध्यम लक्ष्य पर ध्यान एकाग्र करने का वर्णन किया
जाता है ॥ २६ ॥
विशेष—मध्यम लक्ष्य का तात्पर्य है विशेष ध्यान का कोई पदार्थ, जिसे
न तो शरीर के भीतर कल्पित किया जाता है और न बाहर, न मनको जिस पर
बिना किसी स्थान पर उसका संकेत पाये केन्द्रित करना होता है । एक विशेष
पदार्थ का विचार मनमें सयत कर सम्पूर्ण ध्यान इसी पर केन्द्रित किया जाता है ।
पदार्थ का चुनाव साधक की अभिरुचि पर निर्भर है । लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित
करने से मन की चंचलता मिट जाती है । ध्यान एकाग्र करने का पदार्थ वास्तविक
या काल्पनिक तेजोमय अथवा शीतल, आकाररहित अथवा आकारसहित हो
सकता है । लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रखने की अवधि में योगसाधक को यह कभी
नहीं भूलना चाहिये कि उसे अपने भीतर ( शरीर के भीतर ) तथा ब्रह्माण्ड-
व्यवस्था के भीतर सभी स्तरों की प्रापंचिक सत्ताओं में शिवशक्ति के आनन्दमय
तादात्म्य का साक्षात्कार करना है तथा स्वरूपानन्द में तल्लीन होना है ।
व्योमपंचक
अथ व्योमपञ्चकं लक्षयेदाकाशं पराकाशं महाकाशं
तत्त्वाकाशं सूर्याकाशमिति व्योमपञ्चकं बाह्याभ्यन्तरेऽत्यन्त
निर्मलं निराकारमाकाशं लक्षयेदथवा बाह्याभ्यन्तरेऽत्यन्तान्ध
कारनिभं पराकाशमवलोकयेदथवाभ्यन्तरकालानलसंकाशं
महाकाशमवलोकयेदथवा बाह्याभ्यन्तरे निजतत्त्वस्वरूपं तत्त्वा-
काशमवलोकयेदथवा बाह्याभ्यन्तरे सूर्यकोटिनिभं सूर्याकाश-
मवलोकयेत् स्वयं व्योमपञ्चकावलोकनेन व्योमसदृशो
भवति ॥३०॥
( आत्मा का स्वरूप आकाश की तरह व्यापक है । उस आत्मा की
स्वरूपाभिव्यक्ति के लिये ध्येयरूप पाँच आकाश का ध्यान निर्दिष्ट किया जाता
है ।) आकाश, पराकाश, महाकाश, तत्वाकाश और सूर्याकाश—आकाश के पाँच
भेद हैं, यही व्योमपंचक कहा जाता है । शरीर के बाहर-भीतर अत्यन्त निर्मल
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६७
निराकार आकाश का ध्यान करना चाहिये अथवा शरीर के बाहर-भीतर अत्यन्त
अन्धकारमय पराकाश का ध्यान करना चाहिये, शरोर के भीतर प्रलयकाल की अग्नि
के समान महाकाश का ध्यान करना चाहिये अथवा (चिदाकाश) तत्वाकाश का
ध्यान करना चाहिये; अथवा शरीर के बाहर-भीतर करोड़ों सूर्यों के समान
प्रकाशमय सूर्याकाश का ध्यान करना चाहिये । इस तरह साधक पाँचों आकाश का
ध्यान कर आकाश के समान निर्मल, व्यापक, तेजोमय और दिव्य हो
जाता है ॥ ३० ॥
विशेष—मन को आकाश या शून्य पर एकाग्र करने से व्यावहारिक व्यष्टि-
चेतना की शुद्धि होती है । वह चेतना व्योम में समान सर्वव्यापक हो जाती है ।
उक्तं च—
नवचक्रं कलाधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् ।
सम्यगेतन्न जानाति स योगी नामधारकः ॥ ३१ ॥
जो योगी शरीर में स्थित नौ चक्र, सोलह आधार, तीनों लक्ष्य और पाँचों
व्योम को अच्छी तरह नहीं जानता है, वह नाम मात्र से ही योगी है, योगतत्त्वज्ञ
नहीं है ॥ ३१ ॥
अष्टांगयोग
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टां-
वङ्गानि । यम इति उपशमः सर्वेन्द्रियजयआहारनिद्राशीत-
वातातपजयश्चैवं शनैः शनैः साधयेत् ॥ ३२ ॥
(अष्टांगयोग का वर्णन किया जाता है ।) यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये ही योग के आठ अंग हैं । यम का
आशय है उपशम (इन्द्रियादि को वश में रखकर शान्ति) प्राप्त करना । साधक
को धीरे-धीरे यथाक्रम समस्त इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों की ओर से मोड़कर
आत्मचिन्तन में लगाकर उन्हें वश में रखकर आहार, निद्रा, शीत, वात और आतप
आदि द्वन्द्वों को नियन्त्रित कर (युक्ताहारविहार-पूर्वक) योगसाधना में तत्पर
होना चाहिये ॥ ३२ ॥
६८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति