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सर्वकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 222 में से

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पृष्ठ 92

ॐ गोरष देव अष्ट चक्र वोलिये घट भीतर । ये कौण-कौण
वोलिये । अवधू प्रथमें आधार चक्र वोलिये । गुदा अस्थांने, चत्र दल
कंवल, षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि द्रिष्ट चक्र, लिंग अस्थांने, षट्
दल कंवल षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि मणिपुर चक्र, नाभि अस्थांने,
दस दल कंवल, षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि अनहद चक्र, हिरदा
सथांने, द्वादश कंवल, षट सै साँस । तिस चक्र ऊपरि विसुध चक्र,
कंठसथांने, षोडश कंवल, एक सहंसर साँस । अजपा गायत्री पारब्रह्म
ध्यान । तिस चक्र ऊपरि अगनि चक्र, नेत्र सथांने षोडश दल कंवल
एक सहस्त्र साँस, अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि
गिनांन चक्र, ब्रह्मं'ड सथांने, एक सहंस्र दल कंवल एक सहस्र साँस ।
अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि सुछिम चक्र, विग्यांन
सथांने एक बीस सहस्र दल कंवल । ए अष्ट कमल का जांणौ भेव ।
आपै करता आपै देव । ( गोरखबानी अष्टचक्र )
स्पष्ट है कि महायोगी गोरखनाथ ने चक्र-साधना का परमफल स्वरूपाव-
स्थानपूर्वक परम शून्य में परमात्मा शिव का साक्षात्कार बताया है । चक्र
साधना की अन्तर्ज्योति से सम्पूर्ण अखण्ड, अनन्त, निरञ्जन सच्चिदानन्द में
आत्मा प्रतिष्ठित होकर परमात्मस्वरूप हो जाता है ।
सोलह आधार
अथ षोडशाधारः कथ्यते तत्र प्रथमं पदाङ्गुष्ठाधारं
तत्राग्रतस्तेजोमयं ध्यायेत् । दृष्टिः स्थिरा भवति ॥ १० ॥
अब यथाक्रम सोलह आधारों का निरूपण किया जाता है । पहला
पादांगुष्ठाधार है । उसके अग्रभाग में तेजोमय स्वरूप का ध्यान करना चाहिये,
इस ध्यान से दृष्टि स्थिर होती है ॥ १० ॥
विशेष—हमारे शरीर के भीतर अनेक तेजोमय स्थान अथवा केन्द्र हैं, जिन
का ध्यान करने से योगसाधक को अपने प्राण, मन और विन्दु के लय में बड़ी
सुविधा होती है । महायोगी गोरखनाथजी ने ऐसे प्रधान केन्द्रों को चक्र कहा
है और उपर्युक्त तेजोमय स्थानों को आधार कहा है, जो सोलह हैं । आधार
५० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति