सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजीभ को उलट कर इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा वाले संगम-त्रिपथ में लगाना
चाहिये, यह व्योमचक्र है, यही खेचरी मुद्रा है।
कलां पराङ्मुखीं कृत्वा त्रिपथे परियोजयेत् ।
सा भवेत्खेचरी मुद्रा व्योमचक्रं तदुच्यते ॥
चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे गता।
तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा सिद्धैर्निरूपिता ॥
ऊर्ध्वजिह्वः स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति यः।
मासार्धेन न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित् ॥
( हठयोगप्रदीपिका ३। ३७, ४१, ४४ )
तालु के ऊपर विवर में ऊर्ध्वमुखी जीभ से सहस्रार से क्षरित चन्द्रामृत का
तालु-आधार में पान कर योगी पन्द्रह दिनों में ही मृत्यु के भय से रहित हो
जाता है।
एकादशमथ जिह्वाधारं तत्र जिह्वाग्रं धारयेत् सर्वरोग-
नाशो भवति ॥ २० ॥
ग्यारहवाँ जिह्वाधार है। जिह्वामूल में जिह्वा के अग्रभाग को लगाना
(स्पर्शपूर्वक स्थिर करना) चाहिये। इस अभ्यास से (साधक के) समस्त
रोगों का नाश होता है ॥ २० ॥
द्वादशं भ्रूमध्याधारं तत्र चन्द्रमण्डलं धारयेत्, शीतलतां
याति ॥ २१ ॥
बारहवाँ भ्रूमध्याधार है। वहाँ चन्द्रमण्डल का ध्यान करना चाहिये, उसकी
धारणा करने से-ध्यान करने से साधक का अङ्ग शीतल-हृष्टपुष्ट और
प्रसन्नतायुक्त होता है ॥ २१ ॥
विशेष—दोनों भृकुटियों का मिलन-स्थान ही भ्रूमध्याधार है, यह आज्ञा
चक्र का स्थान है। यहाँ दृष्टि एकाग्र कर जब साधक शुभ्र, स्वच्छ-निर्मल चन्द्र-,
मण्डल का ध्यान करता है, तब उसका शरीर सौम्य, शान्त और स्थिर हो जाता
है। इस स्थान से मन विशेष रूप से अमनस्क की भूमिका में पहुँच जाता है,
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