सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
वश में हो जाता है, यह वैश्वानरी धारणा है। वायुतत्व सुरमा के रंग का है,
यह भ्रू में स्थित है, इसके अधिष्ठातृ देवता ईश्वर हैं, इसका बीज 'य' है। मन-
प्राणसहित वायुतत्व की धारणा करनी चाहिये, पाँच घड़ी तक की धारणा से
साधक को आकाश-गमन की शक्ति प्राप्त हो जाती है। यह वायवी धारणा है।
आकाशतत्व स्वच्छ जल के समान निर्मल है, इसका बीज 'ह' कार है, इसके
अधिष्ठात देवता नाथस्वरूप सदाशिव हैं, यह तत्व ब्रह्मरन्ध्र में स्थित है, मन और
प्राण को लय कर पाँच घड़ी तक साधक को आकाशतत्व की धारणा करनी चाहिये,
यह नभोधरणा है, इसके अभ्यास के फलस्वरूप मोक्ष का बन्द दरवाजा खुल जाता
है। गोरखनाथजी की सबदी ( गो० बा० सबदी १६८) है कि—आकास
तत सदासिव जांण ) । इन पाँच महाभूतों की धारणा से मोक्ष की प्राप्ति
होती है।
महर्षि पतञ्जलि का कथन है कि शरीर के बाहर या भीतर—कहीं एक
विशेष देश ( स्थान ) में चित्त को ठहराना ही धारणा है।
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।
( योगदर्शन ३ । १ )
जहाँ चित्त को लगाया जाता है, उसी ध्येय में चित्त की एकाग्रता ध्यान
है और जब ध्यान में केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति होती है और चित्त का
निज स्वरूप शून्य-सा अथवा तदाकार हो जाता है, तब वही समाधि है। इन
तीनों धारणा, ध्यान और समाधि को महर्षि पतञ्जलि ने संयम कहा है। ये
तीनों अन्तरंग साधन हैं। पञ्च भूततत्व की वश्यता के सम्बन्ध में योगदर्शन में
कहा गया है :
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजयः ।
( योगदर्शन ३ । ४४ )
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पाँच भूत हैं। इनमें प्रत्येक की पाँच
अवस्था होती है। पहली स्थूलावस्था है। इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभव में आने
वाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इनकी स्थूलावस्था है। दूसरी स्वरूपावस्था
है। पृथ्वी की मूर्ति, जल का गीलापन, अग्नि की उष्णता और प्रकाश, वायु की
गति और कम्पन, आकाश का अवकाश स्वरूपावस्था है। तीसरी सूक्ष्मावस्था है।
कारण-अवस्था या तन्मात्रा ही सूक्ष्मावस्था है। पृथ्वी की गन्ध तन्मात्रा, जल
८४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
की रसतन्मात्रा, अग्नि की रूपतन्मात्रा, वायु की स्पर्श तन्मात्रा और आकाश की
शब्दतन्मात्रा ही सूक्ष्मावस्था है । चौथी अन्वय-अवस्था है । पाँचों भूतों में तीनों
गुणों के स्वभाव ( प्रकाश, क्रिया और स्थिति ) की व्याप्ति ही अन्वय-अवस्था
है । पाँचवीं अर्थवत्व-अवस्था का तात्पर्य है कि पाँचों भूत पुरुष के भोग और
अपवर्ग के लिये हैं । इन भूतों की प्रत्येक अवस्था के क्रम से सम्पूर्ण अवस्थाओं में
संयम कर जब योगसाधक इन को प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उसका इन भूतों पर-
तत्वों पर अधिकार हो जाता है ।
अथ ध्यानमिति कश्चन परमाद्वैतस्य भावः स एवात्मेति
यथा यद्यत्स्फुरति तत्तत्स्वरूपमेवेति भावयेत् सर्वभूतेषु
समदृष्टिश्च इति ध्यानलक्षणम् ॥ ३८ ॥
( अष्टांगयोग के सातवें अंग ) ध्यान का वर्णन किया जाता है । ( नाम-
रूप से परे ) अद्वैतस्वरूप परमात्मा है, यही आत्मा है । जो-जो वस्तु प्रतीत हो,
उस में आत्मस्वरूप की ही भावना करनी चाहिये, समस्त भूतमात्र में समदृष्टि-
आत्मदृष्टि अथवा आत्मस्वरूप की ( सभी प्राणियों में एकमात्र परमात्मा की
व्याप्ति की ) भावना ही ध्यान है । यही ध्यान का लक्षण है ॥ ३८ ॥
विशेष-महायोगी गोरखनाथजी ने अष्टांगयोग के सातवें अंग ध्यान की
सार्थकता के लिये निराकार आत्मस्वरूप में तथा सम्पूर्ण चैतन्य-परमात्मा की
अभिव्यक्ति में समदृष्टि को बड़ा महत्व दिया है । अपनी एक संक्षिप्त रचना
में उन्होंने कहा है कि एकमात्र ध्येय-ध्यान का विषय निरञ्जन है, निरञ्जन
के उपरान्त ध्यान के लिये रह ही क्या जाता है :
निरंजन उपरांति ध्यान नाहीं ।
( गोरखबानी-सिष्टपुराण )
गोरखनाथजी का कथन है कि ध्यान दर्शन है, चैतन्य तत्व का सर्वत्र
अनुभव ही दर्शन अथवा ध्यान है । साधक आज्ञाचक्र में स्थित दोनों भ्रू के मध्य
में प्रदीप्त ज्ञानदीप्ति- -ज्ञाननेत्र अथवा शिवनेत्र की ज्योति से समृद्ध होकर
दर्शन की सीमा में-ध्यान की दशा में अलखनिरञ्जन--परमेश्वर शिव में
प्रतिष्ठित हो जाता है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८५
दरसण माहीं आपै आप ॥
( गोरखवानी सबदी २७२ )
महर्षि पतञ्जलि की दृष्टि में जिस ध्येय वस्तु में चित्त लगाया जाय, उसी
में उसका एकाग्र हो जाना, ध्येय मात्र की एक ही तरह की वृत्ति का प्रवाह
चलना, किसी दूसरी वृत्ति का बीच में न उठना ध्यान है।
'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ।'
( योगदर्शन ३ । २ )
ध्यान का विशिष्ट उपक्रम आत्मा में चित्तवृत्ति का लय होना है। सहस्रार
कमल का ज्ञान प्राप्त होने पर साधक की चित्तवृत्ति लय को प्राप्त हो जाती है।
योगी की चित्तवृत्ति जब लय को प्राप्त होती है, तब अखण्ड ज्ञानस्वरूप निरंजन
आत्मा का प्रकाश होता है। ब्रह्माण्ड में अपने ( आत्मचैतन्य ) प्रतीक का ध्यान
करना चाहिये, जब ध्यान में चित्त स्थिरता को प्राप्त हो जाय, तब उसमें महत्
शून्य का चिन्तन करना चाहिये। आदि, मध्य और अन्तरूप शून्य में करोड़ों सूर्यं
के समान प्रभावाले और करोड़ों चन्द्रमा के समान शीतल प्रकाशवाले शून्य
रूप आत्मा के दर्शन ( ध्यान ) का अभ्यास करने वाले साधक को सिद्धि प्राप्त
होती है।
चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन् योगी भवेद् ध्रुवम् ।
तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपी निरञ्जनः ॥
ब्रह्माण्डबाह्ये संचिन्त्य स्वप्रतीकं यथोदितम् ।
तमावेश्य महच्छून्यं चिन्तयेदविरोधतः ॥
आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
चन्द्रकोटिप्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाप्नुयात् ।
( शिवसंहिता ५ । १६५-१६७ )
इस प्रकार का ध्यान बड़ा उपयोगी होता है और साधक का मन अथवा
चित्त जब वृत्तिहीन हो जाता है, तब वह पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर आत्मस्वरूप
में स्थित होता है।
वृत्तिहीनं मनः कृत्वा पूर्णारूपं स्वयं भवेत् ॥
( शिवसंहिता ५ । २०६ )
८६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
महर्षि घेरण्ड ने ध्यान के तीन भेद बताये हैं। पहला स्थूल ध्यान है, दूसरा
ज्योतिर्ध्यान है और तीसरा सूक्ष्मध्यान है। जिस ध्यान में मूर्ति, इष्टदेव अथवा
गुरु का चिन्तन हो, वह स्थूल ध्यान है, जिसमें तेजोमय ब्रह्म या शक्ति की भावना
हो वह ज्योतिर्ध्यान है, जिसमें विन्दुमयं ब्रह्मकुण्डलिनी का ध्यान हो, वह सूक्ष्म
ध्यान है।
स्थूलं ज्योतिस्तथा सूक्ष्मं ध्यानस्य त्रिविधं विदुः।
स्थूलं मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं तथा।
सूक्ष्मं विन्दुमयं ब्रह्मकुण्डली परदेवता ॥
(घेरण्डसंहिता ६।१)
भ्रूमध्य में और मन के ऊर्ध्व भाग में ॐकारमय शिखामालायुक्त ज्योति
का ध्यान ही ज्योतिर्ध्यान अथवा तेजो ध्यान है। शाम्भवी मुद्रा के अभ्यास द्वारा
कुण्डलिनी महाशक्ति का ध्यान सूक्ष्म ध्यान है।
महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि योगी के हृदय में विद्यमान आत्मवस्तु
का निश्चल चिन्तन ही ध्यान है। सगुण ध्यान, निर्गुण ध्यान के रूप में ध्यान
के दो प्रकार हैं।
सर्वं चिन्तासमावर्ति योगिनो हृदि वर्तते।
या तत्वे निश्चला चिन्ता तद्धि ध्यानं प्रचक्षते ॥
द्विधा भवति तद्ध्यानं सगुणं निर्गुणं तथा।
सगुणं वर्णभेदेन निर्गुणं केवलं विदुः॥
(विवेकमार्तण्ड १६५-१६६)
गुणमात्रोपलक्षित वर्णपद सगुण ध्यान का विषय है। शुद्धचैतन्यविषयक
ध्यान निर्गुणं ध्यान है। निर्गुणं ध्यान का फल समाधि है।
निर्गुणध्यानयुक्तस्य समाधिश्च ततो भवेत्।
(योगतत्त्वोपनिषद्)
ध्यानयोग के द्वारा साधक आत्मसाक्षात्कार में समर्थ होता है। साधक को
भावना करनी चाहिये कि—
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८७
निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ।
अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥
( श्वेताश्वतर० ६ । १९ )
मैं कलाओं से रहित, क्रियारहित, शान्त, निर्विकार, निरञ्जन, अमृत के
परमसेतु, जले इन्धन से युक्त अग्नि की भाँति ज्योतिःस्वरूप परमात्मा का चिन्तन
करता हूँ । यही योगसाधक के लिये निराकार आत्मस्वरूप के ध्यान का गोरखनाथ
जी द्वारा भी निर्दिष्ट क्रम है ।
अथ समाधिलक्षणं सर्वतत्त्वानां समावस्था निरुद्यमत्व
मनायासस्थितिमत्त्वमिति समाधिलक्षणम् । इत्यष्टाङ्गयोग-
लक्षणम् ॥ ३६ ॥
समाधि के लक्षण का निरूपण किया जाता है । समस्त तत्त्वों की समावस्था-
गत अनायास, स्वाभाविक ( सहज ) स्थिति ही समाधि का लक्षण है । ( इस
वर्णन में समाधिसिद्धि राजयोग परिलक्षित है । ) इस तरह अष्टांगयोग के लक्षण
का निरूपण-वर्णन किया गया ॥ ३६ ॥
विशेष—समस्त तत्त्वों की समावस्था का आशय है तत्त्वों की अभेदरूपता—
आत्मस्वरूप में विद्यमानता । इस समावस्था में सहज प्रतिष्ठा ही समाधि
( राजयोग ) की सिद्धि है । यही उन्मनी अथवा सहजावस्था है । समाधि के
दो रूप हैं—पहला सविकल्प ( सबीज अथवा सम्प्रज्ञात ) समाधि है; दूसरा
निर्विकल्प ( निर्बीज अथवा असम्प्रज्ञात ) समाधि है । जब तक ध्याता, ध्येय
और ध्यान—इन तीनों का साधक को प्रतिभास होता है, तब तक सम्प्रज्ञात
समाधि है और ध्याता और ध्यान ध्येय में समाहित--आकारित हो जाते हैं, तब
निर्विकल्प समाधि की अवस्था समझनी चाहिये । इस समाधि की सिद्धि होने
पर योगी को बिना परिश्रम के ही सहज रूप से जाग्रत् अवस्था में भी समाधि
लगी रहती है, सर्वत्र उसकी चित्तवृत्ति आत्माकारित हो उठती है, । उन्मनी
समाधि के परे की अवस्था शून्य है, योगसिद्ध पुरुष को स्वरूप में स्थिति का फल
शून्य समाधि है । शून्य समाधि में परिचय (आत्मस्वरूप ज्ञान अथवा स्वरूपवोध)
से अटल पद—शाश्वत सनातन पद में स्थैर्य्य की प्राप्ति होती है ।
८८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
सुंनि कै परचै भयः सथोर । निश्चल जोगी गहर गंभीर ॥
( गोरखबानी सबदी २३१ )
महर्षि पतञ्जलि ने समाधि के स्वरूप का वर्णन किया है कि जब ध्यान में
केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति होती है और चित्त का निजस्वरूप शून्य-सा हो
जाता है, तब यह ध्यान ही समाधि हो जाता है ।
तदेवार्थ. [त्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ।
( योगदर्शन ३।३ )
महाराजा भोज ने योगदर्शन के उपर्युक्त सूत्र के भाष्य में समाधि का लक्षण
बताया है कि जिसमें मन विक्षेपों को हटाकर यथार्थता से धारण किया जाता
है--एकाग्र किया जाता है, वही समाधि है ।
'सम्यगाधीयत एकाग्रो [क्रियते, विक्षेपान्परिहृत्य मनो यत्र स
समाधिः ।'
( भोजवृत्ति ३।३ )
समाधि में ब्रह्म अपने साकार रूप में-ध्येय रूप में प्रतिभासित होता है
और निराकार रूप में ( निर्बीज समाधि में ) ज्योतिस्वरूप अभिव्यक्त अथवा
प्रकाशित होता है। यह ब्रह्मपद मन-वचनसापेक्ष नहीं है, साधन की सिद्धि से
अमल ज्ञानरूप में स्वयं स्फुरित ( प्रकाशित ) होता है ।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद् ध्रुवम् ॥
( शिवसंहिता ५। २१६ )
महर्षि घेरण्ड का कथन है कि कुम्भक की सिद्धि के द्वारा मन को आत्मा
के स्वरूपभूत करना चाहिये, इस तरह परमात्मा के योग से समाधि राजयोग-
समाधि है ।
परात्मनः समायोगात् समाधिं समवाप्नुयात् ॥
( घेरण्डसंहिता ७। १६ )
हठयोगप्रदीपिका में उल्लेख है कि योगी जाग्रत्, सुषुप्ति आदि सभी अवस्थाओं
से रहित और समस्त चिन्ताओं से परे होकर शव के समान शरीर धारण करता
है, ब्रह्मारन्ध्र में प्राण लीन कर लेता है, वह निस्सन्देह मुक्त है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८६
सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सर्वचिन्ताविवर्जितः ।
मृतवत् तिष्ठते योगी स मुक्तो नात्र संशयः ॥
( हठयोग प्र० ४ । १०७ )
महायोगी गोरखनाथजी ने विवेकमार्तण्ड में कहा है कि जब जीवात्मा और
परमात्मा का समत्व—ऐक्य स्थापित हो जाता है, तो वही समाधि है। संकल्प
शून्यता की स्थिति प्रत्यक्ष हो जाती है।
यत्समत्वं द्वयोरत्र जीवात्मपरमात्मनोः ।
समस्तनष्टसङ्कल्पः समाधिः सोऽभिधीयते ॥
( विवेकमार्तण्ड १६६ )
निरालम्ब, निराकार, निरामय, निराधार परब्रह्म में—अलखनिरञ्जन
परमेश्वर में योगाभ्यास के फलस्वरूप योगी स्वस्थ हो जाता है। यही अष्टांगयोग
की महती प्रतिष्ठा अथवा सिद्धि है। गीता के छठें अध्याय के दसवें श्लोक से
२६वें श्लोक तक अष्टांगयोग की साधना का ही वर्णन यथाक्रम उपलब्ध होता
है। गीता में वर्णन है कि मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखनेवाला,
आशारहित, संग्रहरहित योगी अकेला ही एकान्त स्थान में स्थित होकर आत्मा
को निरन्तर परमात्मा में लगाये । .... .... अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस
समय परमात्मा में अच्छी तरह स्थित हो जाता है, उस समय सम्पूर्ण भोगों में
स्पृहारहित साधक योगयुक्त हो जाता है ।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्तः आसीत मत्परः ॥
( गीता ६ । ११-१४ )
क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ योगी उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त
बुद्धि के द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ
भी चिन्तन न करे।
६० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
( गीता ६ । २६ )
सर्वव्यापी अनन्त चेतन में एकीभाव से स्थितिरूप योगयुक्त आत्मावाला
तथा सर्वात्मदर्शी योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को
आत्मा में कल्पित देखता है । महायोगी गोरखनाथ ने यमनियमासनप्राणायाम-
प्रत्याहारधारणाध्यानसमाधियुक्त योगसाधना के द्वारा अलख निरञ्जन परमेश्वर
की अभिव्यक्ति—सर्वत्र परिव्याप्ति का अनुभव ही श्रेयस्कर स्वीकार किया है
द्वैताद्वैतविवर्जित स्वसंवेद्य परमतत्व की रसानुभूति ही योगकल्पतरु का सिद्ध
( परिपक्व ) फल है ।
इतिशिवगोरक्षरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ द्वितीयोपदेशः ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६१
तीसरा उपदेश
[ पिण्डसंवित्ति ]
पिण्डमध्ये चराचरं यो जानाति स योगी पिण्डसंवित्ति-
र्भवति ॥ १ ॥
( पिण्डविचार के उपरान्त उसके फलस्वरूप पिण्डज्ञान का उपदेश किया
जाता है। यद्यपि हाड़मांसरक्तमज्जामेदादि से गठित व्यष्टिपिण्ड प्रत्यक्ष है और
इस सम्बन्ध में इसका निरूपण असंगत-सा है तथापि इसमें चराचर समस्त
ब्रह्माण्ड परिव्याप्त है, इसलिये पिण्डज्ञान-निरूपण का फल है पिण्ड में व्याप्त
समस्त ब्रह्माण्ड की परिचयप्राप्ति जो योगी इस पिण्ड में चर, अचर, समस्त
ब्रह्माण्ड का ज्ञान प्राप्त करता है, वह पिण्डसंवित्ति ( पिण्डज्ञानी ) हो जाता है ।
योगी पिण्ड ( समष्टि-व्यष्टि पिण्ड ) का ज्ञानी हो जाता है ॥ १ ॥
विशेष—व्यष्टि पिण्ड ( शरीर में अस्मदादि अन्तःकरणाभिमानी जीव
( -आत्मा ) है और समष्टि पिण्ड में विराट् हिरण्यगर्भादि ( परमात्मा )
परिव्याप्त हैं। समष्टिपिण्ड व्यापक, अधिक शक्तिशाली है, सर्वेश्वर सत्यसंकल्प
होने से अस्मदादि शरीरों का कारण और नियन्ता है, व्यष्टि पिण्ड ( शरीर )
विनाशी है, क्षणभंगुर है, उसका अभिमानी जीव कर्मपाश से आबद्ध है । योग-
साधक ब्रह्माण्डगत कार्य-व्यवहार का ज्ञान अपने व्यष्टि पिण्ड में प्राप्त कर,
कर्मपाश से मुक्त होकर परमशान्त और सच्चिदानन्दरूप आदिनाथ, अलख
निरञ्जन परमेश्वर के स्वरूप का बोध प्राप्त कर तदाकार हो जाता है ।
६२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
सप्त पाताल तथा अनेक लोकादि
कूर्मः पादतले वसति पातालं पादाङ्गुष्ठे तलातलमङ्गुष्ठाग्रे
महातलं पादपृष्ठे रसातलं गुल्फं सुतलं जङ्घायां वितलं जान्वोर-
तलमूर्वोरैव सप्तपातालं रुद्रदेवाधिपतये तिष्ठति पिण्डमध्ये क्रोध-
रूपी भावः स एव कालाग्निरुद्रः ॥ २ ॥
कूर्म पैर के नीचे ( पादतल में ) व्यष्टि शरीर के आश्रय के रूप में स्थित
है ( जिस तरह कूर्म--शिवशक्ति की आत्माभिव्यक्ति का एक रूप ब्रह्माण्ड-शरीर
का आश्रय है ) । नीचे के सात लोक-सप्तपाताल हमारे व्यष्टि-शरीर में स्थित
हैं । पैर के अँगूठे में पाताल, अँगूठे के अग्रभाग में तलातल, पादपृष्ठ में रसातल
गट्टे ( गुल्फ ) में सुतल, जाँघ में वितल और जानु में अतल स्थित है। इन सातों
पाताल के अधिष्ठातृ देवता रुद्र हैं । पिण्ड में क्रोधरूपी भाव ही कालाग्निरुद्र है ।
रुद्र व्यष्टि पिण्ड ( शरीर ) में क्रोध के रूप में निवास करता है ॥ २ ॥
विशेष-योगी का लक्ष्य एक आत्मा--अलख निरञ्जन, द्वैताद्वैतविवर्जित
परमात्मा को समस्त प्रकार के शरीरों में देखना और समस्त प्रापंचिक सत्ताओं
के मौलिक आध्यात्मिक स्वरूप को पहचानना है । यही समस्त पिण्डों, प्रापंचिक
सत्ताओं तथा ब्रह्माण्ड-व्यस्था का सच्चा ज्ञान है । जब योग-साधक की व्यावहारिक
चेतना यथेष्ट शुद्ध और आलोकित हो जाती है, तब पूर्ण का प्रत्येक अंश में
अनुभव किया जाता है । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का प्रत्येक व्यष्टि-पिण्ड में
अनुभव किया जाता है तथा समस्त व्यष्टि-शरीरों की मौलिक एकता स्पष्ट रूप
से प्रकट हो जाती है । जो योगसाधक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का व्यष्टि-शरीर
में अनुभव करता है, वही शरीर का सच्चा ज्ञाता है । निर्वाण--परम कैवल्य
पद की प्राप्ति अपने शरीर में ही प्रत्यक्ष है । उस निर्वाण-पद की खोज काया
में करनी चाहिये, ऐसा गोरखनाथजी का ज्ञानोपदेश है ।
जोग जुक्त जब पावै ग्यांना । काया खोजै पद निरबाना ॥
सप्तदीप नवखंड ब्रह्माण्डा । धरती आकास देवा रवि चंदा ॥
तजिवा तिहुँ लोक निवासा । तहाँ निरंजन जोति प्रकासा ॥
( गोरखवानी-प्राणसंकली २-३ )
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६३
अलख निरञ्जन की ज्योति, जो सप्त-द्वीप, नौ खण्ड, समस्त ब्रह्माण्ड,
धरती, आकाश, देवताओं, रवि और चन्द्रमा तथा तीनों लोक में प्रकट है, हमारे
व्यष्टि-पिण्ड में अभिव्यक्त है । समस्त पिण्ड-ब्रह्माण्ड-व्यवस्था में अलख निरञ्जन
ही ज्योतित है, समस्त ब्रह्माण्ड उसी की अभिव्यक्ति है ।
अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे-
ऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः ।
अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च
येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥
( मुण्डकोपनिषद् १ । ६ )
परमेश्वर से ही समस्त पर्वत, समुद्र उत्पन्न हैं, अनेक आकारवाली नदियाँ
वह रही हैं । समस्त औषधि और रस उत्पन्न हैं । प्राणियों के हृदय में यही
निरञ्जन परमेश्वर अधिष्ठित है, इसी परम तत्व की प्राप्ति ही योगसाधक का
प्रतिपाद्य है । श्रीमद्भागवत पुराण के दूसरे स्कन्ध के पहले और पाँचवें अध्याय तथा
पाँचवें स्कन्ध के चौबीसवें अध्याय में सप्तपाताल की स्थिति आदि का विशिष्ट
वर्णन उपलब्ध होता है । शिवसंहिता में इस देह—व्यष्टिपिण्ड को ब्रह्माण्ड कहा
गया है । इसी देह में सात द्वीपों के सहित सुमेरुपर्वत, सरिता, सागर, पर्वत,
क्षेत्र, नक्षत्र, ऋषि, ग्रह, सूर्य, चन्द्र आदि विद्यमान हैं ।
देहेऽस्मिन् वर्तते मेरुः सप्तद्वीपसमन्वितः ।
सरितः सागराः शैलाः क्षेत्राणि क्षेत्रपालकः ॥
ऋषयो मुनयः सर्वे नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ।
पुण्यतीर्थानि पीठानि वर्तन्ते पीठदेवताः ॥
सृष्टिसंहारकर्तारौ भ्रमन्तौ शशिभास्करौ ।
नभोवायुश्च वह्निश्च जलं पृथ्वी तथैव च ॥
त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्वाणि देहतः ।
मेरुं संवेष्ट्य सर्वत्र व्यवहारः प्रवर्तते ।
जानाति यः सर्वमिदं स योगी नात्र संशयः ॥
( शिवसंहिता २ । १-४ )
तीनों लोक में जितने भी प्राणी-पदार्थ हैं, वे सभी शरीरस्थ सुमेरु-मेरुदण्ड
के आश्रय में व्यवहाररत हैं ।
६४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथादेशं व्यवस्थितः ।
मेरुशृङ्गे सुधारश्मिर्वहिरष्टकलायुतः ॥
( शिवसंहिता २ । ५ )
ब्रह्माण्ड-शरीर और व्यष्टि-शरीर में कोई भेद नहीं है । जिस तरह ब्रह्माण्ड
शरीर में सभी देश और सुमेरु आदि स्थित हैं, उसी तरह व्यष्टि-पिण्ड में भी
सुमेरु आदि स्थित हैं ।
भूर्लोकं गुह्यस्थाने भुवर्लोकं लिङ्गस्थाने स्वर्लोकं नाभि-
स्थाने । एवं लोकत्रय इन्द्रो देवता पिण्डमध्ये सर्वेन्द्रय-
नियामकः स एवेन्द्रः ॥ ३ ॥
भूः ( पृथ्वी ) लोक ( हमारे ) व्यष्टि-शरीर के मूलाधार ( गुह्यस्थान )
में, भुवः लोकं लिङ्ग प्रदेश में और स्वः लोक नाभिदेश में स्थित हैं । ( शिव-शक्ति
की एक अन्य आत्माभिव्यक्ति ) इन्द्र इन तीनों लोकों का नियन्ता, शासक
अथवा इन्द्र कहा गया है, यही व्यष्टि शरीर और समस्त इन्द्रियों का नियामक
होने से इन्द्र ही है ॥ ३ ॥
दण्डाङ्कुरे महर्लोको दण्डकुहरे जनोलोको दण्डनाले तपो
लोको मूलकमले सत्यलोक एवं लोकचतुष्टये ब्रह्मादिदेवता
पिण्डमध्येऽनेकमानाभिमानस्वरूपी तिष्ठति ॥ ४ ॥
मेरुदण्ड के मूल में ( प्रजापति दक्ष का वास-स्थान ) महः लोक है । मेरुदण्ड
के कुहर ( छिद्र ) में जनः लोक है, मेरुदण्डनाल में तपः लोक और मूलाधार
कमल ( चक्र ) में सत्यलोक है । इन चारों लोकों में ( शिवशक्ति की ही
आत्माभिव्यक्ति ) ब्रह्मादि ही अधिपति हैं और इस पिण्ड में अनेकमानाभिमानरूप
ब्रह्म का ही ( मेरुदण्ड में ) आधिपत्य है ॥ ४ ।
विशेष—महः, जनः तपः और सत्य, ये चारों लोक व्यष्टि-शरीर में सुषुम्ना
नाड़ी के उच्चतर क्षेत्रों में स्थित माने गये हैं । ज्यों-ज्यों साधक समाधि के
उच्चतर स्तरों पर उठकर शरीर के अन्तरतम तत्व में गहनता से प्रवेश करता है,
त्यों-त्यों वह इन उच्च—सूक्ष्मातिसूक्ष्म लोकों की स्थिति का अपने शरीर के भीतर
अनुभव करता है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६५
विष्णुलोकः कुक्षौ तिष्ठति तत्र विष्णुर्देवता पिण्डमध्ये-
ऽनेकव्यापारको भवति । हृदये रुद्रलोकस्तत्र रुद्रो देवता
पिण्डमध्य उग्रस्वरूपो तिष्ठति । वक्षःस्थल ईश्वरलोकस्तत्रे-
श्वरो देवता पिण्डमध्ये तृप्तिस्वरूपी तिष्ठति । कण्ठमध्ये
नीलकण्ठलोकस्तत्र नोलकण्ठो देवता पिण्डमध्ये नित्यं तिष्ठति ।
तालुद्वारे शिवलोकस्तत्र शिवो देवता पिण्डमध्येऽनुपमस्वरूपी
तिष्ठति । लम्बिकामूले भैरवलोकस्तत्र भैरवो देवता पिण्डमध्ये
सर्वोत्तमस्वरूपी तिष्ठति । ललाटमध्येऽनादिलोकस्तत्रानादि
देवता पिण्डमध्य आनन्द पराहंतास्वरूपी तिष्ठति । शृङ्गाटे
कुललोकस्तत्रकुलेश्वरो देवता पिण्डमध्ये आनन्दस्वरूपी
तिष्ठति । शङ्खमध्ये नलिनोस्थानेऽकुलेश्वरो देवता पिण्डमध्ये
निरभिमानावस्था तिष्ठति । ब्रह्मरन्ध्रे परब्रह्मलोकस्तत्र
परब्रह्म देवता पिण्डमध्ये परिपूर्णदशा तिष्ठति । ऊर्ध्वकमले
लोकस्तत्र परमेश्वरो देवता पिण्डमध्ये परापरभावस्तिष्ठति ।
त्रिकूटस्थाने शक्तिलोकस्तत्र पराशक्तिर्देवता पिण्डमध्येऽस्ति-
त्वावस्था सर्वासां सर्वकर्तृत्वावस्था तिष्ठति । एवं पिण्डमध्ये
सप्तपातालसहितैकविंशति ब्रह्माण्डस्थानविचारः ॥ ५ ॥
( जिस तरह ब्रह्माण्ड में विष्णुलोकादि उच्चलोक स्थित हैं, उसी तरह
व्यष्टि-पिण्ड में वर्तमान इन शिवशक्तिरूप में अभिव्यक्त उच्च सूक्ष्म लोकों का
साधक दर्शन कर परमात्मा का साक्षात्कार करता है ।) हमारे व्यष्टि-पिण्ड में
कुक्षि ( नाभि-देश -उदर ) में विष्णुलोक है, वहाँ रक्षण-पोषण आदि अनेक
व्यापार ( कार्य ) में तत्पर भगवान् विष्णु विराजमान हैं । हृदय में रुद्रलोक है,
उसमें अपने उग्र रूप में संहार आदि कार्यों में तत्पर भगवान् रुद्रदेव विद्यमान हैं ।
हृदय से थोड़ा ऊपर वक्षःस्थल है, उसमें ईश्वरलोक है, उसमें पिण्ड के मध्य में
तृप्तिस्वरूप ईश्वर देवता विराजमान हैं । कण्ठ के मध्य में नीलकण्ठ लोक है,
वहाँ नीलकण्ठ ( शिव ) शरीर के भीतर नित्य स्थित हैं । तालुद्वार में शिवलोक
६६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
है, वहाँ अनुपमस्वरूप भगवान् शिव पिण्ड में स्थित हैं। जिह्वामूल ( लम्बिका
के मूल ) में भैरवलोक है, वहाँ सर्वोत्तमस्वरूप भैरव देवता विराजमान हैं।
ललाटदेश में अनादि लोक है, वहाँ अनादि ( शिव ) पिण्ड के मध्य में आनन्दमय
परम अहंतारूपी विद्यमान हैं। इस देहपिण्ड में भृकुटी से कुछ ऊपर शृङ्गाट-स्थान
है, उसमें कुल लोक है, वहाँ ( शक्तियुक्त ) कुलेश्वर ( शिव ) आनन्दस्वरूप
विराजमान हैं। शंख नाड़ी के ऊपर मध्य में नलिनी स्थान में अकुलेशलोक है,
वहाँ अभिमान-अवस्था से रहित ( निर्विकार-निरञ्जन ) साक्षात् परमशिव—
अकुलेश्वर देवता विद्यमान हैं। ब्रह्मरन्ध्र मे परब्रह्मलोक है, वहाँ अखण्ड-अनन्त
पूर्ण परब्रह्म विराजमान है। ऊर्ध्व कमल सहस्रार में परमेश्वर -- परापर भाव में
विद्यमान हैं। सहस्रार के ( परापर लोक के ) ऊपर त्रिकूट-त्रिशिखर-लोक में
( शक्तिलोक में ) अपने अस्तित्वस्वरूप में सर्वनियामिका और सर्वस्व कर्तृत्वरूपा
पराशक्ति विराजमान है। इस तरह व्यष्टि-पिण्ड में सप्त पातालसहित इक्कीस
ब्रह्माण्ड स्थान का विचार ( वर्णन ) किया गया ॥ ५ ॥
विशेष —ये विष्णुलोकादि परमात्मा के ब्रह्माण्ड-शरीर के अन्तर्गत व्याव-
हारिक अस्तित्वों से विभिन्न स्तरों के रूप में स्वीकृत हैं। ये उच्चलोक सामान्य तथा
असामान्य इन्द्रियानुभवों के क्षेत्रों के ऊपर हैं तथा उनमें से कुछ हमारी साधारण
मानसिक और बौद्धिक धारणाओं के क्षेत्र के भी ऊपर हैं। गुरु के प्रसाद—
अनुग्रह से हमारी चेतना आन्तरिक रूप से इन लोकों के स्तरों पर उठती है तथा
शरीर के अन्तर्गत इन स्तरों के सत्य का स्पष्ट अनुभव प्रकाशित अथवा प्राप्त
होता है।
चार वर्ण आदि
सदाचारतत्त्वे ब्राह्मणास्तिष्ठन्ति । शौर्ये क्षत्रिया व्यवसाये
वैश्याः सेवाभावे शूद्राश्चतुष्षष्ठिकलास्वपि चतुष्षष्ठि
वर्णाः ॥ ६ ॥
सदाचार में ब्राह्मण, वीरता (शौर्य) में क्षत्रिय, व्यवसाय में वैश्य, सेवाभाव
में शूद्र, चौसठ कलाओं ( के व्यवहार ) में चौसठ तरह के ( कलाव्यवसायी )
लोग स्थित रहते हैं ॥ ६ ॥
विशेष—महायोगी गोरखनाथजी का कथन है कि वर्णाश्रमसम्मत आचार-विचार
से सम्पन्न संयमित जीवन वाले सभी लोग योग की साधना के अधिकारी हैं और
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६७
सभी को समान रूप से स्वसंवेद्य अलखनिरञ्जन परमात्मतत्व सहज प्राप्त है।
समस्त वर्ण (चारों वर्ण) परमात्मा—विराट् पुरुष के सर्वाङ्ग हैं। वेद का
अनुशासन है। ब्राह्मण विराट् पुरुष के मुख से, क्षत्रिय (राजन्य) बाहु से,
ऊरू से वैश्य और पद से शूद्र (सेवाभाव में तत्पर लोग) उत्पन्न हैं। प्रत्येक
जीवात्मा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के रूप में विद्या, बुद्धि (सदाचार), वीरता,
धैर्य, संतोष-सम्पन्नता और सेवाभाव से युक्त होकर परमात्म सृष्टि के संचालन में
न्यूनाधिक योगदान करता है, यही इस पुरुषसूक्त के मन्त्र (ऋग्वेद १०।६०।१२)
का आशय है। गीतोक्त चारों वर्ण की सृष्टि का भगवद्वचन के अनुरूप यही
तात्पर्य है।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
(गीता ४।१३)
अतएव पुरुषसूक्त में ऋषि का यह मन्त्रदर्शन सर्वथा सत्य है :—
ब्राह्मणोस्यमुखमासीद् वाहूराजन्यः कृतः।
ऊरूतदस्ययद्वैश्यं पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥
(ऋग्वेद १०।६०।१२)
गीता में ही श्रीकृष्ण के वचन हैं कि अन्तःकरण का निग्रह करना, इन्द्रियों
का दमन करना, धर्मपालन के लिये कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना,
दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इन्द्रिय और शरीर को सरल रखना,
वेद, शास्त्र, ईश्वर, परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेदादि का अध्ययन-अध्यापन
करना और परमात्मतत्व का अनुभव करना ब्राह्मण का स्वाभाविक कर्म है।
शौर्य, तेज, धैर्य, युद्ध से न भागना, दान देना और स्वामित्व, ये क्षत्रिय के कर्म
हैं। खेती, गोपालन वैश्य के कर्म हैं और सेवा में तत्परता शूद्र के कर्म में परिगणित
है। अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में प्रवृत्ति से सिद्धि प्राप्त होती है।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
(गीता १८।४६)
जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति है और जिससे यह समस्त
जगत् व्याप्त है, उसकी अपने-अपने स्वाभाविक कर्म से अर्चना कर मनुष्य सिद्धि
को प्राप्त होता है। विराट् पुरुष के सृष्टि-संचालन में उससे उत्पन्न प्राणी के
योगदान का यही रहस्य है।
६८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
सप्त द्वीप तथा सप्त समुद्र
अथ सप्तसमुद्राः सप्तद्वीपाश्च कथ्यन्ते । मज्जाया
जम्बूद्वीपोऽस्थिषु शाकद्वीपः शिरासु सूक्ष्मद्वीपश्चत्वक्षु क्रौञ्च
द्वीपो रोमसु गोमय द्वीपो नखेषु श्वेतद्वीपो मांसे प्लक्षद्वीप एवं
सप्तद्वीपाः ॥ ७ ॥
( जिस तरह ब्रह्माण्ड-शरीर में सात समुद्र तथा सात द्वीप स्थित हैं, उसी
तरह हमारे पिण्ड ( शरीर ) में उनकी यथास्थान स्थिति है । ) सात समुद्रों
और सातों द्वीपों का वर्णन किया जाता है । हमारे व्यष्टि-पिण्ड में मज्जा में
जम्बूद्वीप, हड्डी में शाकद्वीप, प्रवाहिका नाड़ियों में सूक्ष्म द्वीप, त्वचा में क्रौंच द्वीप,
रोमों में गोमय द्वीप, नखों में श्वेत द्वीप और मांस में प्लक्ष द्वीप हैं । ( योगसाधक
को इन सातों का ध्यान करने से शरीर में ही इनके साक्षात्कार और इनमें गति
करने की शक्ति प्राप्त होती है । श्रीमद्भागवत पुराण के पञ्चम स्कन्ध के बीसवें
अध्याय में इन द्वीपों के सम्बन्ध में विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है । ) हमारे
व्यष्टि-पिण्ड में यही सात द्वीपों की भावना है ॥ ७ ॥
मूत्रे क्षारसमुद्रो लालायां क्षीरसमुद्रः कफे दधिसमुद्रो
मेदसि घृतसमुद्रो वसायां मधुसमुद्रो रक्ते इक्षुसमुद्रः शुक्रेऽमृत
समुद्र एवं सप्तसमुद्राः ॥ ८ ॥
( जिस तरह ब्रह्माण्ड में खार ( क्षार ) समुद्र, क्षीर समुद्र, दधि समुद्र,
घृत समुद्र, मधु समुद्र, इक्षु समुद्र और अमृत समुद्र स्थित हैं, उसी तरह हमारे
शरीर के विभिन्न द्रवों में इन सातों समुद्रों की स्थिति निरूपित की जाती है । )
मूत्र में क्षार समुद्र, लार में क्षीर समुद्र, कफ में दधि समुद्र, मेद-मज्जा में घृत समुद्र
चर्बी में मधु समुद्र, रक्त में इक्षु समुद्र और वीर्य-शुक्र में अमृत समुद्र की स्थिति
का ध्यान करने से ( शरीर में ही ) इन सातों समुद्रों का साक्षात्कार करने की
सामर्थ्य योगसाधक को प्राप्त हो जाती है ॥ ८ ॥
नवखण्ड
नवखण्डा नवद्वारेषु वसन्ति । भारतखण्डः कर्परखण्डः
काश्मीरखण्डः श्रीखण्ड शङ्खखण्ड एकपादखण्डो गान्धार
खण्डः कैवर्त्तखण्डो महामेरुखंड एवं नवखण्डाः ॥ ६ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६६
हमारे व्यष्टि-पिण्ड के नवद्वारों में नवखण्ड स्थित हैं। (जिस तरह
ब्रह्माण्ड-शरीर में नौ खण्ड हैं, उसी तरह हमारे व्यष्टि-पिण्ड के नौ द्वारों में ये
खण्ड विद्यमान हैं।) मूल (गुदा) द्वार में भारत खण्ड, उपस्थ (लिङ्ग छिद्र)
में काश्मीर खण्ड, मुख में कर्पर खण्ड, नासिका के दाहिने रन्ध्र (छिद्र) में
श्रीखण्ड और बायें रन्ध्र में शंखखण्ड, बायें नेत्र में एकपादखण्ड और दायें नेत्र
में गान्धार खण्ड तथा वायें कान (के छिद्र) में कैवर्त्त खण्ड और दायें कान
(के छिद्र) में महामेरु खण्ड स्थित हैं। यथास्थान इन नौ खण्डों का ध्यान
करने से योगसाधक को इनका साक्षात्कार करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है ॥ ६ ॥
. अष्टकुल पर्वत
मेरुपर्वतो मेरुदण्ड तिष्ठति कैलासो ब्रह्मकपाटे वसति
हिमालयः पृष्ठे मलयो वामकन्धे मन्दरो दक्षिणकन्धरे
विन्ध्याद्रिर्दक्षिणकर्णे मैनाको वामकर्णे श्रीपर्वतो ललाट
एवमष्टकुलपर्वता अन्य उपपर्वताः सर्वाङ्गुलिषु वसन्ति ॥१०॥
(जिस तरह ब्रह्माण्ड में अष्टकुल पर्वत हैं, उसी तरह हमारे व्यष्टि-पिण्ड में
भी उनका यथास्थान वर्णन किया जाता है।) शरीर में—मेरुदण्ड में सुमेरु पर्वत,
मस्तक में कैलास पर्वत, पीठ में हिमालय पर्वत, बायें कंधे में मलय पर्वत और
दायें कंधे में मन्दराचल, दायें कान में विन्ध्याचल, बायें कान में मैनाक पर्वत,
ललाट में श्रीशैल तथा सभी अँगुलियों में अन्य उपपर्वतों (छोटे-बड़े पहाड़ों)
का ध्यान करने से उनका साक्षात्कार करने में योगसाधक समर्थ होता हैं ॥१०॥
नौ नदी तथा अन्य उपनदियाँ
पोनसा, यमुना, गङ्गा, चन्द्रभागा, सरस्वती, पिपासा,
शतरुद्रा, श्रोरात्रिश्रोनर्मदा एवं नवनद्यो नवनाडोषु वसन्ति ।
अन्य . उपनद्यः कुल्योपकुल्या, द्विसप्तति सहस्त्रनाडीषु
वसन्ति ॥ ११ ॥
१०० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
( जिस तरह ब्रह्माण्ड-पिण्ड में गंगा आदि बड़ी नदियाँ तथा छोटी नदियाँ
बहती हैं, उसी तरह हमारे शरीर की प्रधान नाड़ियों में गंगा आदि तथा छोटी-
छोटी सूक्ष्म नाड़ियों में अन्य छोटी-पतली नदियाँ बहती हैं । ) गंगा इडा नाड़ी
में, यमुना पिंगला नाड़ी में, सरस्वती सुषुम्ना में तथा पीनसा, चन्द्रभागा,
पिपासा, शतरुद्रा, श्रीरात्रि और नर्मदा प्रधान नाड़ियों में प्रवाहित हैं और छोटी
तथा पतली नदियाँ बहत्तर हजार शेष नाड़ियों में बहती हैं । ( इन्हीं बहत्तर
हजार नाड़ियों में पिंगला आदि परिगणित हैं । ) इन नदियों का यथास्थान शरीर
में ध्यान करने से तथा इन पर सूक्ष्म दृष्टि एकाग्र करने से योगसाधक इनका
साक्षात्कार करने में समर्थ होता है ॥ ११ ॥
नक्षत्रादि
सप्तविंशति नक्षत्राणि, द्वादशराशयो, नवग्रहाः, पञ्चदश-
तिथय एतेऽन्तर्वलये द्विसप्ततिसहस्र कोष्ठेषु वसन्ति । अनेक
तारामण्डलमूर्मिपुञ्जे वसति । त्रयस्त्रिंशत् कोटि देवता बहुरोम-
कूपेषु वसन्ति । दानवयक्षराक्षसपिशाचभूतप्रेता अस्थिसन्धिषु
वसन्ति । अनेकपीठोपपीठका रोमकूपेषु वसन्ति । अन्ये पर्वता
उदरलोमसु वसन्ति । गन्धर्वकिन्नरकिंपुरुषा अप्सरोगणा
उदरे वसन्ति । अन्ये खेचरीलीलामातरः शक्तयः उग्रदेवता
वायुवेगे वसन्ति । अनेकमेघा अश्रुपाते वसन्ति अनन्तसिद्धा
मतिप्रकाशे वसन्ति । चन्द्रसूर्यौ नेत्रद्वये वसतः । अनेकवृक्षलता
गुल्मतृणानि जङ्घारोमकस्थाने वसन्ति । अनेककृमिकीट-
पतङ्गा पुरोषे वसन्ति ॥ १२ ॥
( जिस तरह ब्रह्माण्ड में नक्षत्र, ग्रह, राशि तथा किन्नर, गान्धर्वलोक आदि
तथा कीट-पतंग—सभी यथास्थान हैं, उसी तरह हमारे पिण्ड-शरीर में ये सब
विद्यमान हैं । ) हमारे व्यष्टि-पिण्ड में ( अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी,
मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त,
चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण,
धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपदा, रेवती) सत्ताईस नक्षत्र, बारह राशि,
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १०१
( मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन ),
नौ ग्रह ( सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु ( बृहस्पति ), शुक्र, शनि, राहु, केतु ),
पन्द्रह तिथि ( प्रतिपदा आदि )—ये सब शरीरस्थ मांस-पेशियों—बहत्तर हजार
कोठों में निवास करते हैं। तारामण्डल हड्डियों में अथवा भूख-प्यास रूपी ऊर्मियों
में स्थित है। तैंतीस करोड़ देवता असंख्य रोम-छिद्रों में निवास करते हैं।
दानव, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत-प्रेत हड्डियों के जोड़ों में बसते हैं। अनेक
पीठ-उपपीठ रोमछिद्रों में स्थित हैं। पेट के बालों में अनेक दूसरे पर्वत हैं।
गन्धर्व, किन्नर, किंपुरुष, अप्सरायें उदर में निवास करते हैं। स्वेच्छा से आकाश
में विहार करने वाली उग्रदेवता लीलारूप मातृ-शक्तियाँ वायु के वेग में स्थित हैं
तथा मेघ अश्रुपात में निवास करते हैं। अनन्त सिद्ध बुद्धि के प्रकाश में रहते
हैं। दोनों नेत्रों में ( बायें में ) चन्द्रमा और सूर्य ( दायें नेत्र में ) निवास करते
हैं। अनेक वृक्षलतागुल्मतृण जांघ के रोमों में स्थित हैं। अनेक कृमि-कीट-पतंग
विष्ठा में रहते हैं ॥ १२ ॥
स्वर्ग-नरक, मुक्ति
यत्सुखं तत्स्वर्गं, यद्दुःखं तन्नरकं, यत्कर्मतद्बन्धनं यन्नि-
र्विकल्पं तन्मुक्तिः स्वरूपदशायां निद्रादौ स्वात्मजागरः
शान्तिर्भवति। एवं सर्वदेहेषु विश्वरूपपरमेश्वरः परमात्मा-
ऽखण्डस्वभावेन घटे घटे चित्स्वरूपो तिष्ठति। एवं पिण्ड-
संवित्तिर्भवति ॥ १३ ॥
युक्ताहारविहारयुक्त संयमित जीवन ही शरीर का सुख है—यही स्वर्ग ( की
भावना ) है, असंयमित तथा आहारविहारव्यतिक्रमजन्य रोगाक्रान्त अवस्था ही
दुःख है, यही नरक ( की भावना ) है। अपने संकल्प की पूर्ति के रूप में फल-
प्राप्ति की भावना से किये गये ( सकाम ) कर्म ही बन्धन हैं और संकल्पशून्य
इच्छारहित सहज-स्वाभाविक अवस्था ही निर्विकल्पता है, यही मुक्ति अथवा
स्वरूपस्थिति एवं कैवल्य है। यद्यपि अज्ञानी की दृष्टि में निद्रादिरूपता ही
स्वरूपस्थिति कही गयी है तथापि यह शुद्ध-बुद्ध आत्मबोधरूप प्रपंचातीत अवस्था
ही आत्मजागृति है, इससे शान्ति प्राप्त होती है, यही जीवन्मुक्ति है। इस तरह
सभी देहों में विश्वरूप परमात्मा—परमेश्वर अखण्डस्वरूप घट-घट में चिद्रूप
व्याप्त है—ऐसा जाननेवाला ही पिण्डसंवित्ति योगी होता है ॥ १३ ॥
इतिश्रीगोरक्षरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ तृतीयोपदेशः ॥
卐
१०२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
चौथा उपदेश
[ पिण्डाधार ]
अस्ति काचिदपरंपरा संवित्स्वरूपा सर्वपिण्डाधारत्वेन
नित्यप्रबुद्धा निजाशक्तिः प्रसिद्धा कार्यकारणकर्तॄणामुत्थान-
दशाङ्कुरोन्मीलनेन कर्त्तारं करोतीत्यनन्तरावाधारशक्तिरिति
कथ्यते । अत्यन्तनिजप्रकाशस्वसंवेद्यानुभवैकगम्यमाना शास्त्र-
लौकिकसाक्षात्कारसाक्षिणी सा परा चिद्रूपिणी शक्तिर्गीयते ।
सैव शक्तिर्यदा सहजेन स्वस्मिन्नुन्मीलन्त्यां निरुत्थानदशायां
वर्तते तदा शिवः स एव भवति ॥ १ ॥
( इस चौथे उपदेश में महायोगी गोरखनाथ ने शिवशक्ति के सामरस्य की
स्थिति की प्रस्तावना निरूपित की है। निजाशक्तिसंयुक्त परासंवित् का विवेचन
किया गया है। जीव का शिवशक्ति में भेदाभाव--अभिन्नता ही सामरस्य
है। यही मोक्ष अथवा परमकैवल्य-स्वरूपावस्थान है। किस प्रकार यह समरसता
स्थापित होती है--इसी का चौथे उपदेश में वर्णन है। यह शक्ति स्वसंवेद्य,
परमशिव से अभिन्न, सम्पूर्ण स्वतन्त्र, कूटस्थ, संवित्स्वरूपा, नित्य प्रबुद्ध
निजाशक्ति है। यह विनाशरहित, समस्त जगत् की आधारस्वरूपा आद्या भवानी
है, यह बुद्धि आदि के अनित्य प्रकाश से भिन्न नित्य प्रकाशरूपा है, यह शक्ति
शरीर आदि कार्य तथा उनके पाँच सूक्ष्म करण और जीव की अभिव्यक्तिरूपी
अवस्था के अंकुर के प्रकाश से समस्त विश्व के कर्ता हिरण्यगर्भादि को भी उत्पन्न
करती है। यह शक्ति शिवकी अत्यन्त अन्तरंग है, भौतिक प्रपंच की अपेक्षा
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १०३