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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 276 में से

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पृष्ठ 209

अध्याय ४ ]        शाङ्करभाष्यार्थ        १९५


[मूल/संस्कृत भाष्य]

कर्मा । महांश्चासावात्मेति महात्मा
सर्वव्यापोत्यर्थः । सदा सर्वदा
जनानां हृदये परमे व्योम्नि हृदा-
काशे जलाद्युपाधिषु सूर्यप्रति-
विम्बवन्निविष्टः सम्यक्स्थित
इत्येतत् । स एव साक्षिरूपेण हृदा
‘हृञ् हरणे’ इति स्मरणाद्धर-
तीति हृत्तेन हृदा नेति नेतीति
निषेधोपदेशेन मनीषायां पुरुषा-
र्थोऽयमपुरुषार्थोऽयमात्मायमना-
त्मेत्येतया विवेकबुद्ध्या मनसा
विचारसाध्यैकत्वज्ञानेन चाभि-
कॢप्तः प्रकाशितोऽखण्डैकरसत्वे-
नाभिव्यक्त इत्येतत् ।
ये जनाः साधनचतुष्टयसंपन्नाः
संन्यासिन एतत्तत्त्वमस्यादि-
वाक्यप्रतिपाद्यैकरूपमखण्डैकरस-
मिति यावद्विदुर्ब्रह्माहमस्मीत्य-
परोक्षीकुर्युस्ते यथोक्तज्ञानिनो-
ऽमृता भवन्त्यमरणधर्माणः पुनरा-
वृत्तिरहिता भवन्तीत्यर्थः ॥१७॥


[भाष्यार्थ / हिन्दी अनुवाद]

है । तथा महान् और आत्मा होनेके
कारण यह महात्मा अर्थात् सर्वव्यापी
है । यह सर्वदा जीवोंके हृदय—
परव्योम यानी हृदयाकाशमें जलादि
उपाधियोंमें सूर्यप्रतिबिम्बके समान
निविष्ट अर्थात् सम्यक्रूपसे स्थित
है ! वही साक्षिरूपसे हृदा—‘हृञ्
हरणे’ ( ‘हृ’ धातु हरणार्थक है )
ऐसी [ धातुसूत्ररूप ] स्मृति होनेके
कारण जो हरण करे उसका नाम
हृत् है उसके द्वारा यानी ‘नेति-
नेति’ इत्यादि निषेधोपदेशसे, मनीषा
—‘यह पुरुषार्थ है और यह
अपुरुषार्थ है, यह आत्मा है और
यह अनात्मा है’ इस प्रकारकी
विवेकबुद्धिसे तथा मनसा—विचार-
साध्य एकत्वज्ञानसे अभिकॢप्त—
प्रकाशित होता—यानी अखण्डैक-
रसस्वरूपसे अभिव्यक्त होता है ।
जो जन अर्थात् साधनचतुष्टय-
सम्पन्न संन्यासिगण इसे ‘यह ‘तत्त्व-
मसि’ आदि वाक्योंसे प्रतिपादित
अखण्डैकरसरूप है’ इस प्रकार
जानते हैं अर्थात् ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस
प्रकार इसका साक्षात्कार करते हैं वे
इस तरह बतलाये हुए ज्ञानीलोग
अमृत—अमरणधर्मा अर्थात् पुनरा-
वृत्तिशून्य हो जाते हैं ॥ १७ ॥