सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 276 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 210

१९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४

ज्ञानसे द्वैत-निवृत्तिका उपदेश

कालत्रयेऽपि मुक्तौ प्रलयादौ | तीनों ही कालमें तथा मुक्ति और
च परमात्मा कूटस्थ इति निश्चया- | प्रलय आदिमें भी परमात्मा कूटस्थ
| ही है—ऐसा निश्चय होनेसे जाग्रत्
जाग्रत्स्वप्नयोरपि भ्रान्त्या सद्द्वि- | और स्वप्नमें भी भ्रान्तिसे ही द्वैत-
| प्रतीति होती है; वस्तुतः तो
तीयत्वावभासः । वस्तुतस्तु सदा | सर्वदा अभेद ही है—यह बात श्रुति
निर्भेद एवेत्याह— | बतलाती है—

यदातमस्तन्न दिवा न रात्रि-
र्नसन चासञ्छिव एव केवलः ।
तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं
प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी ॥१८॥

जिस समय अज्ञान नहीं रहता उस समय न दिन रहता है न
रात्रि और न सत् रहता है न असत्, एकमात्र शिव रह जाता है; वह
अविनाशी और आदित्यमण्डलाभिमानी देवका भजनीय है तथा उसीसे
पुरातन प्रज्ञा (गुरुपरम्परागत ज्ञान) का प्रसार हुआ है ॥१८॥

यदेति । यदा यस्यामवस्था- | 'यदा' इत्यादि । जिस अवस्थामें
| अतम—जिसमें तम (अज्ञान)
यामतमो न तमोऽस्येत्यतमस्तत्त्व- | नहीं है ऐसा अतम रहता है
मादिवाक्यजन्यज्ञानेन दीपस्था- | अर्थात् जब दीपकरूप तत्त्वमस्यादि-
| वाक्यजनित ज्ञानसे अविद्या दग्ध
नीयेन दग्धाविद्या तत्कार्यरूपतम- | हो जाती है, क्योंकि वह अपने
| कार्यरूप तमवाली है, उस समय
स्कत्वात्तदा तत्काले न दिवा | न दिन—दिनका आरोप होता
दीवारोपोऽपि नास्ति न रात्रिस्त- | है और न रात्रि—रात्रिका ही