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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 276 में से

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पृष्ठ 208

१९४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ४
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पर्यन्तेषु जन्तुषु कर्मफलभोग- | गूढ जानकर कर्मफलभोगके साक्षी-
| रूपसे प्रत्यक्षतया वर्तमान रहते
साक्षित्वेन प्रत्यक्षतया वर्तमान- | हुए भी उन (काम-कर्मादि) के
| द्वारा उसका ईश्वरत्व तिरस्कृत हो
मपि तैस्तिरस्कृतेश्वरभावम्। उत्त- | गया है [ इसलिये उसे गूढ कहा
| जाता है]। उत्तरार्धकी व्याख्या
रार्धं व्याख्यातम् ॥१६॥ | की जा चुकी है ॥१६॥

परमात्मसाक्षात्कारके साधन
निर्भेदसुखैकतानात्मनो विश्व- | अब भेदशून्य सुखैकरस आत्माके
| विश्वकर्तृत्व एवं विश्वव्यापित्वका तथा
कृत्त्वं तद्व्यापित्वं संन्यासिभि- | संन्यासियोंद्वारा प्राप्तव्य मोक्ष-
राप्तव्यमोक्षरूपत्वं चाह— | स्वरूपताका वर्णन करते हैं--
एष देवो विश्वकर्मा महात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१७॥
यह सर्वव्यापी देव जगत्कर्ता और सर्वदा समस्त जीवोंके हृदयमें स्थित
है। यह प्रपञ्चनिषेधके उपदेश, आत्मानात्मविवेक-बुद्धि और एकत्वज्ञानके
द्वारा प्रकाशित होता है, इसे जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥१७॥
एष इति । एष प्रकृतो देवो | 'एष देवो' इत्यादि । यह प्रकृत
| देव—द्योतनात्मक परमात्मा विश्वकर्मा
द्योतनात्मको विश्वकर्मा। महदादि | है। महदादि विश्व कर्म, है, यह
| किया जाता है इसलिये कर्म है;
विश्वं कर्म क्रियत इति कर्म माया- | मायाके संसर्गवश विश्वरूप कार्य
| इसीका है इसलिये यह विश्वकर्मा
वेशाद्विश्वरूपं कार्यमस्येति विश्व- |