श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुजी) (८३
उत्कल देश उड़ीसा नगर बैनतेय सब कोउ कहैं।
(श्री) रघुनाथ गुसाँई गरुड़ ज्यों, सिंहपौरि ठाढ़े रहैं।।७१।।
अति अनुराग घर सम्पति सौं रह्यो पागि, ताहू करि त्याग कियौ नीलाचल वास है।
धन को पठावै पिता ऐपै नहीं भावै कछू, देखिवो महाप्रभुजी कौ पास है।।
मन्दिर के द्वार रूप सुन्दर निहार्यो करैं, लग्यौ सीत गात सकलात दई दास है।
शौच संग जायवे की रीति कौं प्रमान वहै, वैसे सब जानौ माधौदास सुखरास है।। ३२७ ।।
महाप्रभु कृष्ण चैतन्य जू की आज्ञा पाइ, आये वृन्दावन राधाकुण्ड वास कियौ है।
रहनि कहनि रूप चहनि न कहि सकैं, थकैं सुनि तन भाव रूप करि लियौ है।।
मानसी में पायौ दूध-भात सरसात हिये, लिये रस नारी देखि बैद कहि दियौ है।
कहाँ लौं प्रताप कहौं आप ही समझि लेहु, देहु वही रीझि जासौँ आगे पाय जियौ है।। ३२८ ।।
श्रीनित्यानन्दजी, श्रीकृष्णचैतन्यजी
नित्यानन्द (कृष्ण) चैतन्य की, भक्ति दसों दिशि विस्तरी ।।
गौड़ देश पाखण्ड, मेटि कियौ भजन परायण।
करुणासिन्धु कृतज्ञ, भये अगतिन गति दायन।।
दसधा रस आक्रान्ति, महत जन चरण उपासे।
नाम लेत निहपाप, दुरित तिहिं नर के नासे।।
अवतार विदित पूरव मही, उभै महन्त देही धरी।
नित्यानन्द(कृष्ण)चैतन्य की, भक्ति दसों दिशि विस्तरी ।।७२।।
श्रीनित्यानन्दजी
आप बलदेव सदा वारुणी सौं मत्त रहैं, चहैं मन मान्यो प्रेम मत्तताई चाखियै।
सोई नित्यानन्द प्रभु महन्त की देही धरी, भरी सब आनि तऊ पुनि अभिलाखियै।।
भयो बोझ भारी किहूँ जात न सँभारी, तब ठौर-ठौर पारषद माँझ धरि राखियै।
कहत-कहत और सुनत-सुनत जाके, भये मतवारे बहु ग्रन्थ ताकी साखियै।। ३२६ ।।
श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुजी
गोपिन के अनुराग आगे आप हारे श्याम, जान्यौ यह लाल रंग कैसे आवै तन में।
ये तौ सब गौर तनी नख-सिख बनी-ठनी, खुल्यौ यों सुरंग अंग-अंग रँगे वन में।।