श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२) (श्री भक्तमाल
ब्रज ही की लीला सब गावैं नीलाचल माँझ, मन भई चाह 'जाय नैननि निहारियै'।
चले वृन्दावन मग लग एक गाँव जहाँ, बाई भक्त भोजन कौं ल्याई चाव भारियै।।
बैठे ये प्रसाद लेत, लेत दृग भरि 'अहो ! कहो कहा बात दुख हिये को उघारियै'।
'साँवरौ कुँवर यह कौन को भुराय ल्याये? माय कैसें जीवै' सुनि मति लै बिसारियै ।। ३२२ ।।
चले और गाँव जहाँ महाजन भक्त रहै, गहे मन माँझ आगे विनती हूँ करी है।
गये वाके घर वह गयौ काहू और घर, भाय भरी तिया आनि पाँयन में परी है।।
ऊपर महन्त कही 'अजू एक सन्त आये' 'इहाँ तौ समाई नाहिं' आई अरबरी है।
कीजिये रसोई 'जोई सिद्ध सोई ल्यावो', दूध नीके कै पिवायो नाम माधौ आस भरी है।।३२३।।
गये उठि पाछे भक्त आयो सो सुनायौ नाम सुनि अभिराम दौरे संग ही महन्त है।
लिये जाय पाँय लपटाय सुखपाय मिले, झिले घर माँझ 'तिया धन्य तो सो कन्त है'।
सन्तपति बोले 'मैं अनन्त अपराध किये ! जिये अब' कही 'सेवौ सीत मानि जन्त है'।
आवत मिलाप होय यही राखौ बात गोय, आये वृन्दावन जहाँ सदाई बसन्त है।। ३२४।।
देखि-देखि वृन्दावन मन में मगन भये, गये श्रीबिहारी जू के चना तहाँ पाये है।
कहि रह्यो द्वारपाल नेकु में प्रसाद लाल, यमुना रसाल तट भोग कौं लगाये है।।
नाना विधि पाक धरैं स्वामी आप ध्यान करें, बोले हरि भावैं नाहिं वेई लै खवाये है।
पूछ्यो सो जनायौ ढूँढ़ि ल्यायौ आगे गायौ, सब तुम तौ उदार हास रस समझाये है।। ३२५ ।।
गये ब्रज देखिवे कौं भाण्डीर में "खेम" रहै, निसि को दुराय खाय कृमि लै दिखाये हैं।
लीला सुनिवे कौं हरियाने गाँव रहे, जाय गोबरहूँ पाथि पुनि नीलाचल धाये हैं।।
घर हूँ को आये सुत सुखी सुनि माता वानी, मारग में स्वप्न दैकै बनिक मिलाये हैं।
याही विधि नाना भाँति चरित अपार जानौ, जिते कछु जाने तिते गायकै सुनाये हैं।। ३२६ ।।
मास परायण चौदह विश्राम
श्रीरघुनाथदास गोसाँईजी
(श्री) रघुनाथ गुसाँई गरुड़ ज्यौं, सिंहपौरि ठाढ़े रहैं।।
सीत लगत सकलात, विदित पुरुषोत्तम दीनी।
शौच गये हरि संग, कृत्य सेवक की कीनी।।
जगन्नाथ पद प्रीति, निरन्तर करत खवासी।
भगवत् धर्म प्रधान, प्रसन्न नीलाचल वासी।।