श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीहितहरिवंश गोसाँईजी) (६५
करिकै रसोई सोई लै प्रसाद पायौ भायो, अमल सो आयो चढ़ि पूछी सो जिताइये।
'फेरि जिनि ऐसी करौ यही दृढ़ हिये धरौ, ढरौ निज चाल' कहि आँखें भरि आइये।। ३५६।।
रूप गुण गान होत कान सुनि सभा सब, अति अकुलान प्रान मूरछा-सी आई है।
बड़े आप धीर रहे ठाढ़े न सरीर सुधि, बुधि में न आवै ऐसी बात लै दिखाई है।।
श्रीगुसाईं कर्णपुर पाछे आय देखे आछे, नेकु ढिंग भये स्वांस लग्यौ तब पाई है।
मानौ आगि आँच लागी ऐसो तन चिह्न भयौ, नयौ यह प्रेम रीति कापै जात गाई है।। ३६०।।
श्रीगोविन्दचन्द आय निसि कौ स्वप्न दियौ, दियौ कहि भेद सब जासौँ पहिचानियै।
रहौं मैं खिरक माँझ पोषैं निसि भोर साँझ, सीचैं दूध धार गाय जाय देखि जानियै।।
प्रगट लै कियौ रूप अति ही अनूप छबि, कवि कैसे कहै थकि रहे लखि मानियै।
कहाँ लौं बखानौं भरै सागर न गागर में, नागर रसिक हिये निसिदिन आनियै।। ३६१।।
रहैं श्रीसनातन जू नन्दगाँव पावन पै, आवन दिवस तीन दूध लैके प्यारियै।
साँवरौ किशोर आप पूछें 'किहिं ओर रहो?' 'कहे चारि भाई' पिता रीतिहूँ उचारियै।।
गये ग्राम बूझी घर हरि पै न पाये कहूँ, चहुँ दिसि हेरि-हेरि नैन भरि डारियै।
अबकै जो आवै फेर जान नहीं पावै सीस, लाल पाग भावै निसिदिन उर धारियै।। ३६२।।
कही व्याली रूप वेनी निरखि सरूप नैन, जानी श्रीसनातन जू काव्य अनुसारियै।
राधासर तीर द्रुम डार गहि झूलैं-फूलैं, देखत लफलफात गति मति वारियै।।
आये यों अनुज पास फिरे आस-पास देखि, भयौ अति त्रास गहे पाउँ उर धारियै।
चरित अपार उभै भाई हितसार पगे, जगै जग माहिं मति मन में उचारियै।। ३६३।।
श्रीहितहरिवंश गोसाँईजी
(श्री) हरिवंश गुसाँई भजन की, रीति सकृत् कोउ जानिहै।।
(श्री) राधाचरण प्रधान, हृदै अति सुदृढ़ उपासी।
कुँजकेलि दम्पत्ति तहाँ, की करत खवासी।।
सर्वसु महा प्रसाद, प्रसिद्ध ताके अधिकारी।
विधि निषेध नहिं दास, अनन्य उतकट व्रतधारी।।
व्यास सुवन पथ अनुसरै, सोई भले पहिचानिहै।
(श्री)हरिवंश गुसाँई भजन की रीति सकृत् कोउ जानिहै ॥६०॥