श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४) (श्री भक्तमाल
श्रीब्रजवल्लभजी
ब्रजवल्लभ वल्लभ सुवन, दुर्लभ सुख नैननि दिये ।।
नृत्य गान गुन निपुन, रास में रस बरषावत।
अब लीला ललितादि, बलित दम्पतिहिं रिझावत ।।
अति उदार निस्तार, सुजस ब्रजमण्डल राजत।
महा महोत्सव करत, बहुत सबही सुख साजत ।।
श्रीनारायण भट्ट प्रभु, परम प्रीति रस बस किये।
ब्रजवल्लभ वल्लभ सुवन, दुर्लभ सुख नैननि दिये ।। ८८ ।।
श्रीरूप-सनातन गोसाँईजी
संसार स्वाद सुख बांत ज्यौं, दुहुँ रूप-सनातन त्यागि दियौ ।।
गौड़देश बंगाल हुते, सबही अधिकारी।
हय गय भवन भण्डार, विभौ भू-भुज उन हारी ।।
यह सुख अनित्य विचारि, वास वृन्दावन कीन्हौ।
यथा लाभ सन्तोष कुँज, करवा मन दीन्हौ ।।
ब्रजभूमि रहस्य राधाकृष्ण, भक्त तोष उद्धार कियौ।
संसार स्वाद सुख बांत ज्यौं, दुहुँ रूप-सनातन त्यागि दियौ ।। ८६ ।।
कहत वैराग गये पागि नाभा स्वामी जू पै, गई यों निवर तुक पाँच लागी आँच है।
रही एक माँझ धर्यौ कोटिक कवित्त अर्थ, याही ठौर लै दिखायो कविता कौ साँच है।।
राधाकृष्ण रस की आचारजता कही यामें, सोई जीवनाथभट्ट छपै वानी नाँच है।
बड़े अनुरागी ये तो कहिवौ बड़ाई कहा, अहो! जिन कृपादृष्टि प्रेम पोथी बाँच है।। ३५७ ।।
वृन्दावन ब्रजभूमि जानत न कोऊ प्राय, दई दरसाय जैसी शुक मुख गाई है।
रीति हूँ उपासना की भागवत अनुसार, लियौ रससार सो रसिक सुखदाई है।।
आज्ञा प्रभु पाय पुनि गोपीश्वर लगे आय, किये ग्रन्थ भाय भक्ति भाँति सब पाई है।
एक-एक बात में समात मन बुद्धि जब, पुलकित गात दृग झरी-सी लगाई है।। ३५८ ।।
रहैं नन्दगाँव रूप आये श्रीसनातन जू, महासुख रूप भोग खीर कौ लगाइये।
नेकु मन आई सुखदाई प्रिया लाड़िली जू, मानौ कोऊ बालकी सुसौज सब ल्याइये ।।