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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

६२) (श्री भक्तमाल

देख्यो जब कष्ट तन प्रभू जू स्वप्न दियौ, 'जावौ मधुपुरी' ऐसे तीन बार भाषियै।
आये जहाँ जाति-पाँति छाये कछु औरे रंग, देख्यो एक खाती साधु संग अभिलाषियै।।
तिया रहे गर्भवती सती मति सोच रती, खोदि भूमि पाई प्रतिमा सुधन राषियै।
खाती को बुलाय कही लही यहु लेहु तुम, उन पाँय परि कह्यौ रूप सुख चाषियै।। ३५१।।
करें सेवा-पूजा और काम नहिं दूजा तब, फैलि गई भक्ति भये शिष्य बहु भायकै।
बड़ोई समाज होत मानौँ सिन्धु सोत आये, विविध बधाये गुनीजन उठे गायकै।।
आई एक नटी गुण रूप धन जटी वह, गावै तान कटी चटपटी-सी लगायकै।
दिये पट भूषण लै भूख न मिटत किहूँ, चहुँ दिसि हेरि पुत्र दियो अकुलायकै।। ३५२।।
रंगीराय नाम ताकी शिष्या एक राना सुता भयो दुख भारी नेकु जलहूँ न पीजियै।
कहिकै पठाई वासौं 'चाहौ सोई धन लीजै', 'मेरो प्रभुरूप मेरे नैननि कूँ दीजियै'।।
'द्रव्य तो न चाहौँ रीझि चाहौँ तन मन दियौ', फेरिकै समाज कियौ विनती कौ कीजियै।
जिते गुनीजन तिनै दिये अनगन दाम पाछे नृत्य कर्यो आप देत सो न लीजियै।। ३५३।।
ल्याई एक डोला में बैठाय रंगीराय जू कौं, सुन्दर सिंगार कही बार तेरी आइयै।
कियौ नृत्य भारी जो विभूति सो तौ वारी, लिये भरि अँकवारी भेंट किये द्वार गाइयै।।
'मोहन न्योछावर में भयौ मोहि लेहु मति, लियौ उन शिष्य तन तज्यौ कहाँ पाइयै।
कह्यौ जू चरित्र बड़े रसिक विचित्रनि कौ, जोपै लाल मित्र कियौ चाहौ हिये ल्याइयै।। ३५४।।

श्रीहरिरामजी हठीले

हरिराम हठीले भजनबल, राणा को उत्तर दियौ।।
उग्र तेज ऊदार, सुघर सुथराई सींवा।
प्रेमपुंज रसरासि सदा, गद्गद सुर ग्रीवा।।
भक्तन को अपराध करै, ताकौ फल गायौ।
हिरण्यकशिपु प्रह्लाद, प्रगट दृष्टान्त दिखायौ।।
सस्फुट वक्ता जगत् में, राजसभा निधरक हियौ।
हरिराम हठीले भजनबल, राणा को उत्तर दियौ।। ८५।।
राणा सौं सनेह सदा चौपर कौं खेल्यौँ करै, ऐसो सो संन्यासी भूमि सन्त की छिनाई है।
जायकै पुकार्यौ साधु झिरकी बिडार्यौ पर्यौ, विमुख के वश बात साँची लै झुठाई है।।